‘खबर लहरिया’ - महिलाओं के बुलंद हौसलों की कहानी

सिर्फ महिलाओं की टीम की ओर से संचालित अखबार (अब पोर्टल) खबर लहरिया पर आधारित डॉक्यूमेंट्री राइटिंग विद फायर को मिला ऑस्कर अवार्ड्स में नॉमिनेशन। 

-ब्यूरो रिपोर्ट-

मुंबई। 94वें ऑस्कर अवार्ड्स में डॉक्यूमेंट्री की श्रेणी में भारत की ओर से राइटिंग विद फायर ने इस लिस्ट में अपनी जगह बना कर सभी को हैरान कर दिया है। बुंदेली बोली में शुरू किए गए महिलाओं के अखबार खबर लहरिया पर आधारित इस डॉक्यूमेंट्री को दुनिया के प्रतिष्ठित अवॉर्ड में से एक एकेडमी अवॉर्ड्स के इस साल के नॉमिनेशन में जगह दी गई है।

थॉमस और सुष्मित घोष द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री राइटिंग विद फायर दलित महिलाओं द्वारा संचालित भारत के एकमात्र समाचार पत्र खबर लहरिया के उदय का वर्णन करती है। राइटिंग विद फायर मुख्य रिपोर्टर मीरा के नेतृत्व वाले दलित महिलाओं के महत्वाकांक्षी समूह की कहानी को दर्शाता है जो प्रासंगिक बने रहने के लिए प्रिंट से डिजिटल माध्यम पर स्विच करती हैं।

खबर लहरिया केवल महिलाओं के द्वारा चलाया जाने वाला देश का इकलौता अखबर है। इसकी शुरुआत साल 2002 में उत्तर प्रदेश के चित्रकुट में निरंतर एनजीओ ने मीरा जाटव, शालिनी जोशी और कविका बुंदेलखंडी के साथ मिलकर की थी। जब इस अखबार की शुरुआत हुई, उस वक्त इसमें काम करने वाली महिला पत्रकार और रिपोर्टर्स खुद अपने हाथ से खबरों को एक पन्ने पर लिखती थीं।

इस अखबार (और अब पोर्टल) में सभी तरह की खबरें होती हैं, लेकिन पंचायत, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास की खबरों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। समाचार स्थानीय बुंदेली बोली में और बड़े अक्षरों में छापे जाते थे, ताकि नवसाक्षर महिलाएं आसानी से पढ़ सकें। राजनीतिशास्त्र से मास्टर डिग्री ले चुकीं मीरा ने कहा कि संवाददाता के रूप में गांव की गरीब महिलाओं के जुड़ने का उनके परिवार व समाज के लोग ही विरोध करते थे, लेकिन अब यह कम हो गया है।

अखबार का उद्देश्य  नारीवादी आवाज को मीडिया में लाने, सदियों से चली आ रहीं कुप्रथाओं को रोकने, कुरीतियों और बाधाओं को पारकर ग्रामीण इलाकों की दलित-आदिवासी महिलाओं को पत्रकार के तौर पर स्थापित करने का रहा है। खबर लहरिया के पत्रकार अपने क्षेत्र में अन्याय की जांच और दस्तावेजीकरण करते हैं। वे स्थानीय पुलिस बल की अक्षमता पर सवाल उठाते हैं। जातीय और लिंग आधारित हिंसा के शिकार लोगों की सुनते हैं और उनके साथ खड़े होते हैं।

साल 2002 में शुरू हुआ यह अखबार 2015 तक निकलता रहा और 2016 में डिजिटल हो गया। अखबार की प्रसार संख्या 4500 और पाठक संख्या करीब 20 हजार रही। मूल्य दो रुपए था। खबर लहरिया देश का पहला ऐसा अखबार है, जिसे दलित महिलाएं चलाती हैं। यह अखबार बुंदेलखंडी भाषा में 2002 से चित्रकूट समेत बुंदेलखंड के कई जिलों से प्रकाशित होता था। हालांकि 2015 में यह बंद हो गया। तब से लेकर अब तक मोबाइल पोर्टल पर खबर लहरिया संचालित है। इस पूरी टीम में महिलाएं ही काम करती हैं। खबर लहरिया के लिए इसके संस्थापक एनजीओ निरंतर को यूनेस्को किंग सेजोंग लिट्रेसी सम्मान 2009 से सम्मानित किया गया था। 

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