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अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करने वाले पत्रकारों के नाम रहा नोबेल शांति पुरस्कार

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-ब्यूरो रिपोर्ट- नई दिल्ली। फिलीपींस की पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मुरातोव को नोबेल शांति पुरस्कार 2021 से सम्मानित किया गया है। दोनों पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के उनके प्रयासों के लिए यह पुरस्कार दिया जा रहा है , जो लोकतंत्र और स्थायी शांति के लिए पहली शर्त है। नार्वे की नोबेल समिति ने शुक्रवार को इन पुरस्कारों की घोषणा की। मारिया रेसा फिलीपींस के समाचार संगठन ' रैपलर ' की सीईओ हैं। नोबेल कमेटी ने बताया कि मारिया रेसा और उनके मीडिया संगठन को राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतर्ते की सरकार के कामों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए कई बार निशाना बनाया जा चुका है। वह गलत जानकारियों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई का भी एक अहम हिस्सा हैं। 2018 में टाइम मैग्जीन ने उन्हें पर्सन ऑफ़ द ईयर की उपाधि दी थी। यूनेस्को के अनुसार मारिया ने पत्रकारिता के दायरे को बढ़ाया है। विरोधाभास परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया। मारिया इससे पहले सीएनएन के लिए करीब दो दशक तक दक्षिण पूर्व एशिया में खोज पत्रकार के रूप में भी कम कर चुकी हैं। ' रिपोर्टर्स वि

जिनके लिए एक अभिशाप है बुढ़ापा!

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  एक तरफ हम नौजवानों का देश होने का दम भर रहे हैं , दूसरी तरफ देश में उम्रदराज आबादी आज तमाम समस्याओं का सामना कर रही है। आधुनिक जीवनशैली में बुजुर्गों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। अकेलेपन के कारण बुजुर्ग बीमारियों का शिकार हो रहे हैं और इसकी वजह से उनमें निराशा और अवसाद की भावना घर करती जा रही है। ज्यादातर बुजुर्गों की दास्तान इतनी सी है कि नौकरी से रिटायर होने के बाद चूंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं था , ऐसे में उनके घर वाले भी उनकी उपेक्षा करने लगे और यहीं से उनके एकाकीपन की यात्रा शुरू होती है। -श्याम माथुर- मौजूदा दौर में हम लगातार इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि हमारा देश युवाओं का देश है , क्योंकि देश की आधी से ज्यादा आबादी नौजवानों की है। लेकिन इस उजली तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि आधुनिक जीवनशैली में बुजुर्गों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। अकेलेपन के कारण बुजुर्ग बीमारियों का शिकार हो रहे हैं और लंबे समय तक कायम रहने वाली बीमारियों के कारण उनमें निराशा और अवसाद की भावना घर करती जा रही है। ऐसे बुजुर्ग मरीजों की इच्छा रहती है कि परिवार के लोग ही उनकी देखभाल करें। परन्तु ऐसा हमेशा सं

ड्रग्स के साथ पुराना है बॉलीवुड का याराना

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  - ब्यूरो रिपोर्ट - मुंबई। बॉलीवुड के साथ ड्रग्स का कनेक्शन एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि इस दफ़ा इसमें सीधे-सीधे कोई स्टार शामिल नहीं है बल्कि बॉलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान का नाम सामने आया है। दरअसल एनसीबी ने शनिवार आधी रात को मुंबई में एक क्रूज़ पर छापा मारा था। एनसीबी ने इस मामले में आर्यन समेत तीन लोगों को गिरफ़्तार किया था। एनसीबी के अनुसार इस छापे में कुल 13 ग्राम कोकीन , 21 ग्राम चरस , एमडीएम प्रतिबंधित दवा की 22 गोलियां और पांच ग्राम एमडी बरामद की गई। अगर आप इसे कोई बहुत बड़ी मात्रा समझ रहे हैं तो जान लीजिए कि भारत में हर साल दो से चार टन चरस और कम से कम 300 टन गांजा बरामद किया जाता है। बॉलीवुड में ड्रग्स के मामलों ने कई बार तूल पकड़ा है , हालाँकि आधिकारिक तौर पर किसी तरह की गंभीर जाँच में कुछ नहीं साबित हुआ है। वैसे फ़िल्म जगत की कुछ हस्तियों को ड्रग्स के चलते जेल जाना पड़ा है तो कई हस्तियों ने ड्रग्स रिहैबिलिटेशन में अपना इलाज करवाया है। अभिनेता संजय दत्त का ड्रग्स लेना तो बॉलीवुड सितारों में सबसे चर्चित मामला रहा है। उनके पिता सुनील

दुनिया के 150 मीडिया संस्थानों के 600 से ज्यादा पत्रकारों की मेहनत के बाद सामने आए पैंडोरा पेपर्स

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  पैंडोरा पेपर्स लीक में दुनिया के करीब 91 देशों के कई अमीर और शक्तिशाली लोगों का नाम इन दस्तावेजों में 300 से ज्यादा भारतीयों के नाम जिनमें सचिन तेंदुलकर , उद्योपति अनिल अंबानी , नीरव मोदी की बहन और किरन मजूमदार शॉ के पति समेत कई बड़े नाम शामिल - ब्यूरो रिपोर्ट - नई दिल्ली। पनामा पेपर्स लीक के बाद अब पैंडोरा पेपर्स लीक सामने आया है। इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स की ओर से की गई जांच में दावा किया गया है कि इस पैंडोरा पेपर्स लीक में दुनिया के करीब 91 देशों के कई अमीर और शक्तिशाली लोगों का नाम हैं , जिन्होंने सरकारों की नजर से अपनी संपत्ति को छुपाने और टैक्स से बचने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का सहारा लिया है। इस पड़ताल में भारत का अखबार ' इंडियन एक्सप्रेस ' शामिल था। अखबार के मुताबिक इन दस्तावेजों में 300 से ज्यादा भारतीयों के नाम हैं जिनमें उद्योपति अनिल अंबानी , नीरव मोदी की बहन और किरन मजूमदार शॉ के पति जैसे लोग शामिल हैं।  बॉलीवुड के कुछ कलाकारों के नाम भी इसमें शामिल हैं , जिनमे जैकी श्रोफ के नाम को लेकर सबसे ज्यादा हैरानी जत

साइबर आजादी पर लगे हैं तमाम पहरे

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हाल ही जारी ‘ फ्रीडम ऑन द नेट ’ रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर की सरकारें साइबर आजादी पर हर साल और अधिक पहरे लगा रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि लोगों के बोलने , विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। दुनियाभर की सरकारें सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी गतिविधियों को लेकर हमेशा चिंतित रहती हैं। चूंकि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया की पहुंच बहुत व्यापक हो गई है , ऐसे में सरकारें सबसे पहले इस पर ही अंकुश लगाना चाहती हैं और इस दिशा में इंटरनेट पर तमाम पहरे लगाना उन्हें सबसे आसान रास्ता नजर आता है। - श्याम माथुर - अगर आप भी उन लोगों में शामिल हैं , जो यह सोचते हैं कि इंटरनेट की दुनिया में आप पूरी तरह आजाद हैं और यहां आप कभी भी , कुछ भी अभिव्यक्त कर सकते हैं , तो थोड़ी फुर्सत निकालकर अमेरिकी थिंकटैंक फ्रीडम हाउस द्वारा संकलित सालाना ‘ फ्रीडम ऑन द नेट ’ रिपोर्ट को पढ़ लीजिए। ‘ फ्रीडम ऑन द नेट 2021-द ग्लोबल ड्राइव टू कंट्रोल बिग टेक ’ टाइटल से पिछले हफ्ते रिलीज यह रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट की आजादी में लगातार 11वंे साल गिरावट दर्ज की गई है। इसक

'मुग़ल-ए-आज़म' के शिल्पी के. आसिफ़ की याद में शानदार जलसा

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  - राजेश बादल - भोपाल। कालजयी फ़िल्म ' मुग़ल-ए-आज़म ' को परदे पर गढ़ने वाले अमर निर्देशक के. आसिफ़ का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इस मौके पर उनके अपने शहर इटावा में शानदार जलसा हुआ। इसमें देश भर से आए प्रशंसक जुटे। शताब्दी का सफ़र पूरा कर चुके इस्लामिया इंटर कॉलेज में एक भव्य   समारोह में बड़ी तादाद में लोगों ने के. आसिफ़ को अपनी धड़कनों में महसूस किया। इसी संस्था में उन्होंने अपनी पढ़ाई की थी। चंबल इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल पाँच साल से उनकी याद में ऐसे कार्यक्रम करता आ रहा है। इस जलसे के लिए मैं बतौर मुख्य अतिथि इटावा पहुँचा था। मेरे साथ वरिष्ठ पत्रकार और अनेक अख़बारों के संपादक रहे भाई डॉक्टर राकेश पाठक भी थे। उन्होंने इस गरिमामय कार्यक्रम का बख़ूबी संचालन किया।विश्व सिनेमा के गहरे जानकार और ख्याति प्राप्त फ़िल्म समीक्षक अजित रॉय भी ख़ास तौर पर मौजूद थे। पत्रकार साथी और फ़िल्म समीक्षक मुर्तज़ा अली ख़ान भी मेहमान के तौर पर शिरकत करने पहुँचे थे। इटावा नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन फुरकान अहमद और इस्लामिया इंटर कॉलेज के प्रबंधक एडवोकेट मो. अल्ताफ तथा क्षेत्र के अनेक प्रतिनिधि और समाज के तमाम वर्गों

आगे निकलने की होड़ और दांव पर जिंदगी

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  निरंतर चुनौतियों के कारण हम सब एक अंधी दौड़ का हिस्सा बन गए हैं और बस , दौड़ते चले जा रहे हैं। न रास्ते की कोई खबर है और न मंजिल की कोई खबर। बेतहाशा दौड़ते-दौड़ते हम एक ऐसी अंधेरी सुरंग की ओर चले जाते हैं , जहां से निकलने का कोई रास्ता हमें नजर नहीं आता। बेहद गहराई के साथ तनाव हमारे जीवन से जुड़ गया है और चाहते हुए भी हम उससे मुक्ति नहीं पा सकते। अहम सवाल यह है कि क्या हम तनाव को अपने जीवन से दूर भगा सकते हैं ? शायद यह मुमकिन नहीं है। लेकिन हां , उसका ठीक तरीके से सामना जरूर कर सकते हैं। - श्याम माथुर - सिर्फ चालीस साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने के बाद अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया और अपने पीछे छोड़ गए अनेक ऐसे सवाल जिनके जवाब का अगर गहराई से विश्लेषण किया जाए , तो निश्चित तौर पर एक ऐसी तस्वीर सामने आएगी , जो हमें बुरी तरह डराती है। इस तस्वीर में बेशुमार रंग हैं , लेकिन हर रंग खौफ और बेबसी की एक ऐसी दुनिया हमारे सामने पेश करता है , जिसमें नकली कहकहे हैं , दिखावटी भरोसा है , पाखंड और झूठ से भरपूर जिंदगी है और दूसरे तमाम लोगों से आगे निकलने की एक बनावटी और खोख