बढ़ रही हैं मीडिया की मुश्किलें

न्यूयॉर्क स्थित संगठन ‘पोलीस प्रोजेक्ट’ की हालिया रिपोर्ट कहती है कि सरकार भारत में पत्रकारों को धमकाकर, गिरफ्तारी या फर्जी मामले दर्ज करके या किसी तरह की पाबंदियां लगाकर चुप करवा रही है। जो सरकार के खिलाफ बोलते हैं उन पर देशद्रोह जैसे मुकदमों और गिरफ्तारी का खतरा लगातार बना रहता है। देश में मीडिया को डराने-धमकाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। संगठन ‘पोलीस प्रोजेक्ट’ की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि देश में विभिन्न स्थानों पर पत्रकारों को काम करने से रोका जाता है और मीडिया के काम में बाधा डालने का काम सीधे सरकार की ओर से या उसके समर्थकों की तरफ से किया जाता है।

-श्याम माथुर-

पिछले हफ्ते पूरा देश पर्वों और त्योहारों की खुमारी में डूबा हुआ था। कोरोना वायरस के खौफ से आजाद होने की खुशी ने पर्व का मजा दोगुना कर दिया था। पर्वों से जुड़े उल्लास के माहौल के बीच देशभर के मीडिया ने न्यूयॉर्क स्थित संगठन ‘पोलीस प्रोजेक्ट’ की उस रिपोर्ट को अनदेखा कर दिया, जिसमें कहा गया है कि भारत में पत्रकारिता एक खतरनाक पेशा बन गया है। देश में मीडिया कर्मियों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनके बारे में समय-समय पर रिपोर्टें सामने आती रही हैं, लेकिन ‘पोलीस प्रोजेक्ट’ की यह रिपोर्ट कई अर्थों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें मीडिया को डराने-धमकाने की बढ़ती प्रवृत्ति की तरफ इशारा किया गया है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि देश में विभिन्न स्थानों पर पत्रकारों को काम करने से रोका जाता है और मीडिया के काम में बाधा डालने का काम सीधे सरकार की ओर से या उसके समर्थकों की तरफ से किया जाता है। संगठन ने पत्रकारों के खिलाफ भारत में हिंसा पर एक शोध किया है, जिसमें इन हमलों की मैपिंग की गई है। संगठन ने विस्तृत अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाले हैं। इस अध्ययन में पिछले मई 2019 से लेकर इस साल अगस्त तक की घटनाओं को शामिल किया गया है। ‘पोलीस प्रोजेक्ट’ की इस रिपोर्ट को आधार बनाकर वेब पोर्टल डीडब्ल्यूवर्ल्ड के स्तंभकार विवेक कुमार ने एक विस्तृत खबर पोस्ट की है।


रिपोर्ट हमें बताती है कि मई 2019 से इस साल अगस्त के बीच भारत में पत्रकारों पर 256 हमले हुए। भारत में पत्रकारों को फर्जी मामलों में गिरफ्तारी से लेकर हत्या तक कई तरह की हिंसा झेलनी पड़ी है जिस कारण भारत में पत्रकारिता एक खतरनाक पेशा बन गया है। पोलीस प्रोजेक्ट ने अलग-अलग विषयों की कवरेज के दौरान हुईं घटनाओं का अध्ययन किया है। इसके मुताबिक जम्मू कश्मीर में 51, सीएए कानून के विरोध प्रदर्शनों के दौरान 26, दिल्ली दंगों के दौरान 19 और कोविड मामलों की कवरेज के दौरान 46 घटनाएं हुईं। किसान आंदोलन के दौरान पत्रकारों के खिलाफ हिंसा की अब तक 10 घटनाएं हो चुकी हैं। बाकी 104 घटनाएं पूरे देश के दौरान अलग-अलग विषयों और समय से जुड़ी हैं।

पोलीस प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कहती है कि इस समयावधि में कुल 228 पत्रकारों को हिंसा का सामना करना पड़ा। संस्था की सुचित्रा विजयन कहती हैं कि भारत में पत्रकारों को सरकार द्वारा ही अलग-अलग तरीकों से काम करने से रोका जा रहा है। विजयन कहती हैं, ‘‘सरकार भारत में पत्रकारों को धमकाकर, गिरफ्तारी या फर्जी मामले दर्ज करके या किसी तरह की पाबंदियां लगाकर चुप करवा रही है। जो सरकार के खिलाफ बोलते हैं उन पर देशद्रोह जैसे मुकदमों और गिरफ्तारी का खतरा लगातार बना रहता है।’’

भारत में इस समय कई पत्रकार जेलों में बंद हैं। केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को पिछले साल अक्टूबर में उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था जब वह उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुए एक बलात्कार और हत्या के मामले की खबर के सिलसिले में यूपी गए थे। कप्पन तभी से आईपीसी की धारा 153ए (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), 124ए (देशद्रोह), 120बी (साजिश), यूएपीए के तहत जेल में हैं। पिछले दिनों उनकी 90 वर्षीय मां का निधन हुआ तब वह अपनी मां से मिल भी नहीं पाए। 

किसान आंदोलन की कवरेज कर रहे एक स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पूनिया को इसी साल 30 जनवरी को दिल्ली के सिंघु बॉर्डर से गिरफ्तार कर लिया गया था। उनपर धारा 186 (सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), धारा 353 (सरकारी अधिकारी पर हमला करना), धारा 332 (लोकसेवक को चोट पहुंचना) और धारा 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। बाद में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।


रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की एक रिपोर्ट में भी भारत को पत्रकारिता के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में शामिल किया गया था। संस्था द्वारा जारी 2021 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को 180 देशों में 142 स्थान मिला है, जो मीडिया स्वतंत्रता की खराब स्थिति को जाहिर करता है। इसी साल रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने दुनिया के 37 ऐसे नेताओं की सूची जारी की थी, जो मीडिया पर लगातार हमलावर हैं। उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है।

मीडिया को लेकर हाल ही जारी एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि कई सरकारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को और प्रतिबंधित करने के अवसर के रूप में कोरोना महामारी का इस्तेमाल किया है। संस्था ने चेतावनी दी है कि दुनिया भर की दमनकारी सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोरोना वायरस को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। इस संबंध में उसने कुछ सरकारों के कदम का भी जिक्र किया। एमनेस्टी की रिपोर्ट का नाम ‘साइलेंट एंड मिसइनफॉर्मेड-फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन इन डेंजर ड्यूरिंग कोविड-19’ है। संस्था ने अपनी रिपोर्ट में दुनिया भर की सरकारों द्वारा घोषित उपायों का हवाला दिया, जिन्होंने 2020 के बाद से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘अभूतपूर्व’ अंकुश लगाया। रिपोर्ट में कहा गया है चीन, जहां पहली बार 2019 में कोरोना वायरस का पता चला था, उसने फरवरी 2020 तक 5,115 लोगों के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू की थी। चीनी अधिकारियों के मुताबिक इन लोगों पर महामारी की प्रकृति की झूठी और हानिकारक जानकारी गढ़ने और फिर जानबूझकर इसे फैलाने का आरोप लगाया गया था।



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