साइबर आजादी पर लगे हैं तमाम पहरे

हाल ही जारी फ्रीडम ऑन द नेटरिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर की सरकारें साइबर आजादी पर हर साल और अधिक पहरे लगा रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि लोगों के बोलने, विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। दुनियाभर की सरकारें सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी गतिविधियों को लेकर हमेशा चिंतित रहती हैं। चूंकि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया की पहुंच बहुत व्यापक हो गई है, ऐसे में सरकारें सबसे पहले इस पर ही अंकुश लगाना चाहती हैं और इस दिशा में इंटरनेट पर तमाम पहरे लगाना उन्हें सबसे आसान रास्ता नजर आता है।

- श्याम माथुर -

अगर आप भी उन लोगों में शामिल हैं, जो यह सोचते हैं कि इंटरनेट की दुनिया में आप पूरी तरह आजाद हैं और यहां आप कभी भी, कुछ भी अभिव्यक्त कर सकते हैं, तो थोड़ी फुर्सत निकालकर अमेरिकी थिंकटैंक फ्रीडम हाउस द्वारा संकलित सालाना फ्रीडम ऑन द नेट रिपोर्ट को पढ़ लीजिए। फ्रीडम ऑन द नेट 2021-द ग्लोबल ड्राइव टू कंट्रोल बिग टेक टाइटल से पिछले हफ्ते रिलीज यह रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट की आजादी में लगातार 11वंे साल गिरावट दर्ज की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि साइबर आजादी पर हर साल पहरे बढ़ते जा रहे हैं और लोगों के बोलने, विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

यह सर्वे नागरिकों को मिली इंटरनेट की आजादी के स्तर के लिए देशों को 100 में से अंक देता है। देशों को दिए गए अंक उन देशों में इंटरनेट की आजादी का स्तर बताते हैं। जिन देशों को शून्य से 39 अंक मिले हैं, इसका मतलब है कि वहां इंटरनेट की आजादी नहीं के बराबर है। 40 से 69 अंक वाले देश ऐसे हैं, जहां आंशिक आजादी है और 70 से ज्यादा अंक वाले देश ऐसे हैं, जहां लोगांे को इंटरनेट पर पूरी आजादी हासिल है। हमारे देश ने इस पैमाने पर 49 अंक हासिल किए हैं, जिसका मतलब यह हुआ कि इंटरनेट पर हम पूरी तरह आजाद नहीं हैं, बल्कि हमारी स्वतंत्रता पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं।

जिन दस दशों में इंटरनेट पूरी तरह आजाद है, उनमें आइसलैंड, एस्तोनिया, कनाडा, कोस्टारिका, ताइवान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और जापान भी हैं। साफ है कि भले ही हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते रहें, लेकिन साइबर आजादी के मामले में हम बहुत पीछे चल रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 70 देशों में से 56 में लोगों को उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के लिए गिरफ्तार या दोषी ठहराया गया। इसमें जून महीने में जेल में बंद किए गए मिस्र के दो सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शामिल हैं। उन्होंने महिलाओं को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। फरवरी में सैन्य जुंटा द्वारा सत्ता पर कब्जा करने और इंटरनेट बंद कर सोशल मीडिया को अवरुद्ध करने और तकनीकी कंपनियों को व्यक्तिगत डेटा सौंपने के लिए मजबूर करने के बाद म्यांमार की रिपोर्ट में भारी आलोचना की गई है।

सर्वेक्षण द्वारा कवर की गई अवधि में कुल मिलाकर कम से कम 20 देशों ने जून 2020 और मई 2021 के बीच लोगों की इंटरनेट तक पहुंच को अवरुद्ध किया। चीन को इंटरनेट स्वतंत्रता के मामले दुनिया का सबसे खराब देशों में रखा गया है, जिसने ऑनलाइन असहमति के लिए भारी जेल की सजा दी। रिपोर्ट में जारी रैंकिंग में चीन और पाकिस्तान पाबंदी लगाने वाले टॉप के देशों में शामिल हैं। रिपोर्ट में पाकिस्तान में इंटरनेट को लेकर जारी किए गए नियमों पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से बनाए गए ये नियम साइबर स्वतंत्रता के लिए घातक हैं। नए नियम में प्रावधान है कि सोशल मीडिया कंपनियों को 5 लाख से अधिक यूजर्स का व्यक्तिगत डेटा मांगने पर सरकार को सौंपना होगा, वहीं सोशल मीडिया कंपनियों को देश में एक या एक से अधिक डेटा सर्वर बनाना होगा। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि म्यांमार, बेलारूस और युगांडा में इंटरनेट पर स्वतंत्रता में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है। अमेरिका को लेकर रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि नवंबर 2020 के चुनावों के बारे में झूठी और कॉन्सपिरेसी वाली सामग्री को प्रचारित करके अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था की नींव हिला दी गई।

दरअसल दुनियाभर की सरकारें सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी गतिविधियों को लेकर हमेशा चिंतित रहती हैं। चूंकि मौजूदा दौर में सोशल मीडिया की प्रभावशीलता और इसकी पहुंच बहुत व्यापक हो गई है, ऐसे में सरकारें सबसे पहले इस पर ही अंकुश लगाना चाहती हैं और इस दिशा में इंटरनेट पर तमाम पहरे लगाना उन्हें सबसे आसान रास्ता नजर आता है। दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आंदोलन याद कर लीजिए। अगस्त, 2020 में शुरू हुआ ये आंदोलन इस साल की शुरुआत में चरम पर था और अब भी जारी है। इस दौरान कई ऐसे मौके भी आए, जब सरकार को इंटरनेट पर बैन लगाना पड़ा। इंटरनेट शटडाउन का लेखा-जोखा रखने वाली वेबसाइट्स ने दावा किया कि 2021 के पहले 40 दिनों में ही सरकारें कम से कम 10 बार इंटरनेट बैन कर चुकी हैं। यह स्थिति तो तब है जबकि 2021 के जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओपन सोसायटीज स्टेटमेंट पर दस्तखत किए हैं। इसमें लिखा है कि राजनीति से प्रेरित इंटरनेट शटडाउन लोकतंत्र और आजादी के लिए खतरा है। हालांकि, इस पर साइन करते हुए मोदी अपनी आपत्तियां जताना भी नहीं भूले कि दुष्प्रचार और साइबर हमले इस राह में बड़ी चुनौतियां हैं।

कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा खत्म करने के बाद केंद्र सरकार ने वहां लंबे समय तक इंटरनेट बंद रखा था। सरकार का कहना था कि ऐसा उसने हालात को बिगड़ने से बचाने के लिए किया। कई मानवाधिकार संगठनों ने इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया और अभिव्यक्ति की आजादी पर ताला कह कर इंटरनेट और फोन पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया। कुछ अर्सा पहले जब देश में समाचार वेबसाइटों, सोशल मीडिया और ओटीटी सेवाओं के लिए दिशा-निर्देश बनाए गए, तब भी यही चिंता जताई गई थी कि इन दिशानिर्देशों की आड़ में सरकार साइबर आजादी को सीमित करने का प्रयास कर रही है। हालांकि सरकार का कहना है कि इन नियमों के पीछे मंशा इंटरनेट पर आम लोगों को और सशक्त बनाने की है।

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