वैचारिक आजादी पर मंडराते खतरे

क्या कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की हमारी आजादी में हस्तक्षेप कर सकता है? क्या कोई भी सोशल मीडिया कंपनी अपने कारोबार के लिए हमारी राजनीति को निर्धारित कर सकती है? ट्विटर को लेकर उठा ताजा मामला सिर्फ राहुल गांधी या कांग्रेस का मामला नहीं है, बल्कि यह हम सबकी वैचारिक स्वतंत्रता से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है। क्या हम किसी भी प्लेटफॉर्म को अपनी वैचारिक आजादी के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति दे सकते हैं?

- मन्जु माहेश्वरी -

सोशल मीडिया के प्रभावी प्लेटफॉर्म ट्विटर के लिए यह बड़ी दिलचस्प स्थिति है। कुछ दिनों पहले ही सरकार ने आरोप लगाया था कि ट्विटर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिशें की जा रही हैं। दरअसल ट्विटर कुछ दिनों पहले नए सरकारी नियमों के पालन में हुई देरी को लेकर सरकार के निशाने पर था। इस आरोप के बीच जून में ट्विटर ने तत्कालीन आईटी मंत्री रवि शंकर प्रसाद का ही हैंडल एक घंटे के लिए बंद कर दिया था। कंपनी का कहना था कि प्रसाद के एक ट्वीट में उसके कॉपीराइट नियमों का उल्लंघन हुआ था, लेकिन प्रसाद ने कंपनी पर अभिव्यक्ति का हनन करने का आरोप लगाया था। सरकार के साथ ट्विटर का यह विवाद किसी अच्छे मोड़ पर पहुंचकर खत्म होता, इससे पहले ही अब विपक्षी दलों ने ट्विटर को अपने निशाने पर ले लिया है। 

ट्विटर द्वारा कांग्रेस पार्टी के नेताओं के कई हैंडल ब्लॉक कर देने के बाद पार्टी के नेता राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। ट्विटर ने कुछ दिनों पहले राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं के खाते ब्लॉक कर दिए थे। कंपनी का कहना था कि गांधी ने दिल्ली में कथित रूप से बलात्कार के बाद जान से मार दी गई एक नौ साल की बच्ची के माता पिता की तस्वीर ट्वीट की थी। ट्विटर का कहना है कि इस संबंध में उसे राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग से शिकायत मिली कि गांधी के ट्वीट से पीड़ित बच्ची की पहचान उजागर हो गई थी, जो किशोर न्याय अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम का उल्लंघन है।

कंपनी ने बताया कि भारतीय कानून के उल्लंघन की वजह से उसने गांधी का हैंडल ब्लॉक कर दिया। साथ ही उन सभी हैंडलों को भी ब्लॉक कर दिया जिन्होंने गांधी के उस ट्वीट को रीट्वीट किया था। ट्विटर के इस कदम का सख्त विरोध जताते हुए गांधी ने इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला बताया है। ‘ट्विटर का खतरनाक खेल’ शीर्षक से यूट्यूब पर एक वीडियो संदेश जारी करते हुए गांधी ने कहा, ‘मेरा ट्विटर बंद कर वो हमारी राजनीतिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप कर रहे हैं। एक कंपनी अपने व्यापार के लिए हमारी राजनीति को निर्धारित कर रही है और एक राजनेता के तौर पर मुझे यह अच्छा नहीं लग रहा है।’

राहुल गांधी का दावा है कि ट्विटर पर लगभग दो करोड़ लोग उन्हें फॉलो करते हैं और अपने इस कदम से ट्विटर ने उन सबका अपना मत रखने का अधिकार छीना है। गांधी का मानना है कि इससे ट्विटर के एक निष्पक्ष मंच होने की धारणा टूट रही है। उन्होंने इसे सरकार के विपक्ष की आवाज दबाने के आरोपों से भी जोड़ा। उन्होंने यहां तक कहा कि हमें संसद में बोलने नहीं दिया जाता। मीडिया पर अंकुश है। और मुझे लगा था कि ट्विटर इन सब के बीच में एक रोशनी की किरण है। लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि ट्विटर एक निष्पक्ष मंच नहीं, बल्कि पक्षपाती मंच है और यह वही करता है जो सरकार उसे करने को कहती है। ट्विटर के इस कदम के विरोध में कांग्रेस को अन्य विपक्षी पार्टियों का समर्थन भी मिला है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने एक ट्वीट में इसकी निंदा की। 

हालांकि ट्विटर का यह लगातार कहना रहा है कि हैंडलों को ब्लॉक या सस्पेंड किए जाने के संबंध में उसके नियम बहुत स्पष्ट हैं। जब कंपनी को किसी भी हैंडल से किए गए किसी ट्वीट के खिलाफ देश के कानून या कंपनी के अपने नियमों के उल्लंघन की शिकायत मिलती है, तो कंपनी उस व्यक्ति को इसके बारे में जानकारी भेजती है। कंपनी जो भी कदम उठाती है उसके बारे में भी संबंधित व्यक्ति को यह जानकारी दी जाती है कि ऐसा किन नियमों के तहत किया जा रहा है। लेकिन हाल के घटनाक्रम के बाद यह बात एक बार फिर साबित हो गई है कि सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म को आप हल्के में नहीं ले सकते। बात जब अभिव्यक्ति की आजादी की आती है, तो सोशल मीडिया भी उतना ही दमदार प्लेटफॉर्म माना जाता है, जितना पहले अखबारों और पत्रिकाओं को माना जाता था। और यही कारण है कि केंद्र सरकार ने हाल ही सोशल मीडिया साइटों के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए। यह पहली बार है जब भारत में समाचार वेबसाइटों, सोशल मीडिया और ओटीटी सेवाओं के लिए दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि इन नियमों के पीछे मंशा इंटरनेट पर आम लोगों को और सशक्त बनाने की है।

अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया को लेकर किए एक रिसर्च में सोशल मीडिया को लेकर बड़े दिलचस्प नतीजे निकाले हैं। कई यूजर्स सोचते हैं कि यह एक आदत है और मानते हैं कि उन्हें अक्सर इसका इस्तेमाल करना चाहिए। सोशल मीडिया के माध्यम से दूसरों की रुचि के बारे में जानना लोगों को अच्छा लगता है। साथ ही लोग उनकी रुचियों को अपने अनुसार ढालना भी चाहते हैं। ऐसे दौर में जबकि सोशल मीडिया लोगांे की दिनचर्या का सबसे जरूरी हिस्सा बन गया है, हमारे लिए यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि हमारे पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान किया जाता है या नहीं। जिस तरह हम अखबारों को लेकर यह उम्मीद लगाते हैं कि वहां अभिव्यक्ति की भरपूर आजादी होनी ही चाहिए, ठीक उसी तरह हमें यह जानने का भी हक है कि ट्विटर या दूसरा कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विचारों को व्यक्त करने की हमारी आजादी पर अंकुश तो नहीं लगा रहा है। ट्विटर को लेकर उठा ताजा मामला सिर्फ राहुल गांधी या कांग्रेस का मामला नहीं है, बल्कि यह हम सबकी वैचारिक स्वतंत्रता से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है। क्या हम किसी भी प्लेटफॉर्म को अपनी वैचारिक आजादी के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति दे सकते हैं? अगर इसका जवाब नहीं है, तो अब अगला सवाल अपने आप से करें कि अपनी वैचारिक आजादी को कायम रखने के लिए हमने क्या किया है। 



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