महामारी के बाद एक नए खतरे की आहट

 दुनिया के तमाम देशों में मेडिकल वेस्ट एक ऐसे पहाड़ का रूप ले चुका है, जो भूमि और समुद्र को प्रदूषित कर रहा है। सर्जिकल मास्क और दस्ताने से लेकर डिस्पोजेबल गाउन और एप्रन तक- ये सब मिलकर हमारी धरती के लिए एक नया खतरा पैदा कर रहे हैं। महामारी के दौरान प्लास्टिक माइक्रोफाइबर से बने करीब 129 अरब डिस्पोजेबल मास्क और 65 अरब डिस्पोजेबल दस्ताने का इस्तेमाल हर महीने किया गया। पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल किया गया प्लास्टिक इसके अलावा है। यह सारा प्लास्टिक फिर से लैंडफिल साइट या समुद्र में पहुंच जाएगा।

- श्याम माथुर -

देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिले हुए सात दशक से अधिक बीत चुके हैं और आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मनाने की तैयारियों में जुटे हैं। लेकिन पर्यावरण संकट से आजादी हमें आज तक नहीं मिली है। हवा से लेकर मिट्टी और पानी तक सभी प्रदूषित हैं। आए दिन सामने आने वाली रिपोर्टें कहती हैं कि शहरों की आबोहवा सांस लेने लायक नहीं बची है और प्रदूषण का स्तर काफी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। हाल के दौर में कोविड-19 के कारण उपजे हालात के बाद प्रदूषण को लेकर पहाड़ जैसी समस्या खड़ी हो चुकी है और इससे भी बड़ी बात यह है कि हम में से ज्यादातर लोग इस समस्या को लेकर बिलकुल गंभीर नहीं हैं।

यह समस्या दरअसल कोविड-19 महामारी के उपचार से जुड़े मेडिकल वेस्ट यानी चिकित्सा संबंधी कचरे के कारण उपजी है। दुनिया के तमाम देशों में यह मेडिकल कचरा एक ऐसे पहाड़ का रूप ले चुका है, जो भूमि और समुद्र को प्रदूषित कर रहा है। सर्जिकल मास्क और दस्ताने से लेकर डिस्पोजेबल गाउन और एप्रन तक- ये सब मिलकर हमारी धरती के लिए एक नया खतरा पैदा कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक महामारी के दौरान प्लास्टिक माइक्रोफाइबर से बने करीब 129 अरब डिस्पोजेबल मास्क और 65 अरब डिस्पोजेबल दस्ताने का इस्तेमाल हर महीने किया गया है। संगठन का अनुमान है कि महामारी के दौरान लगभग 75 प्रतिशत प्लास्टिक जो चिकित्सा अपशिष्ट और लॉकडाउन के दौरान पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल किया गया, वह लैंडफिल साइट या फिर समुद्र में पहुंच जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्र में प्रवेश करने वाला प्लास्टिक का कचरा लगातार बढ़ रहा है। इस बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण से समुद्री और तटीय पारिस्थितिक तंत्रों पर हानिकारक प्रभाव पड़ रहे हैं। यह जलीय जीवों के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य को भी यह खतरनाक तरीके से प्रभावित कर रहा है। समुद्री प्लास्टिक कूड़े से निपटने के लिए जी-20 देशों की प्रतिबद्धता को जारी रखते हुए, 2019 में जापान में ओसाका ब्लू ओशन विजन पर सहमती व्यक्त की गई थी। जी-20 देशों ने 2050 तक अतिरिक्त समुद्री प्लास्टिक कूड़े को समाप्त करने का वचन दिया है। 

समुद्र तक पहुंचने वाले प्लास्टिक के कचरे की मात्रा को कम करने के लिए व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। हमें हर स्तर पर प्लास्टिक की मात्रा को कम कम करने के लिए बदलाव करने चाहिए। लेकिन वर्तमान में की गई अलग-अलग कार्रवाइयां और नीतियां दुनिया भर के महासागरों में प्लास्टिक समस्या को बढ़ा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है महासागरों में प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए पूरी प्लास्टिक आधारित अर्थव्यवस्था में प्रणालीगत बदलाव करने की आवश्यकता है।

इंटरनेशनल रिसोर्स पैनल (आईआरपी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया भर के महासागरों में प्लास्टिक प्रदूषण को पूरी तरह से रोकने में कई चुनौतियां आने वाली है। यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जब कोविड-19 महामारी ने प्लास्टिक कचरे को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

द प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स और सिस्टमिक रिपोर्ट ब्रेकिंग द प्लास्टिक वेव के मुताबिक हर साल समुद्र में लगभग 110 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक पहुंचता है। नवीनतम मॉडलिंग से पता चलता है कि वर्तमान सरकार और उद्योगों द्वारा किए गए वायदो के अनुसार 2040 तक समुद्री प्लास्टिक के कूड़े का मात्र 7 फीसदी ही कम करेंगें। इसलिए व्यवस्था में तत्काल बदलाव करने और ठोस कार्रवाई करने की आवश्यकता है। आईआरपी पैनल के सदस्य स्टीव फ्लेचर ने कहा है कि अब अकेले-अकेले काम करने से बात नहीं बनेगी, इस तरह के बदलावों से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, देशों को एक साथ मिलकर काम करना होगा। प्लास्टिक के कचरे पर पूरी तरह तभी लगाम लगेगी जब नीतिगत लक्ष्यों को वैश्विक स्तर पर आकार दिया जाएगा और राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाएगा।

शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक में करीब 10,500 केमिकल की पहचान की है, जिनमें से 2,489 केमिकल का उपयोग पैकेजिंग, 2,429 का उपयोग वस्त्र बनाने, 2,109 उपयोग खाद्य प्रयोगों में किया जाता है। कुछ केमिकल खिलौने बनाने और 247 केमिकल मास्क सहित चिकित्सा उपकरणों में उपयोग किए जाते हैं। पहचाने गए 10,500 पदार्थों में से शोधकर्ताओं ने 2,480 पदार्थों लगभग 24 फीसदी को खतरनाक केमिकल के रूप में वर्गीकृत किया है। इसका मतलब है कि प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाले सभी रसायनों में से लगभग एक चौथाई या तो अत्यधिक स्थिर होते हैं, जीवों के पेट में जमा हो जाते हैं और ये बहुत जहरीले होते हैं।

पिछले साल जब कोविड-19 के कारण दुनिया के कई हिस्सों में लॉकडाउन लागू किया गया था, तब ना केवल शहरों में प्रकृति की छटा फैली नजर आई थी, बल्कि खुद धरती के सीस्मिक कंपन भी कम हो गए थे। लॉकडाउन झेलने वाले दुनिया के कई हिस्सों से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के कम होने की सूचनाएं आने लगी थीं। एक तरफ तो लगातार कोरोना वायरस के नए नए मामले सामने आने के कारण लोगों को अपने जीवन और देशों को अपनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार काफी कम करनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर, इस अवसर का फायदा उठाते हुए प्रकृति अपनी मरम्मत करती नजर आ रही थी। लोग यहां तक कहने लगे थे कि धरती के लिए अच्छा ही साबित हुआ कोरोना वायरस का लॉकडाउन। दुनिया के अलग अलग हिस्सों से तमाम लोगों ने अपनी सरकारों को कोरोना संकट बीत जाने के बाद भी प्रकृति को हर साल कुछ दिनों का ऐसा ही ब्रेक देने के आइडिया पर विचार करने की सलाह दी है।

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