सरकारी शह पर मीडिया की जासूसी

बड़े अपराधियों और आतंकवादियों की जासूसी के लिए बनाए गए सॉफ्टवेयर पेगासस’ के जरिये सरकार ने अपने लोगों की जासूसी की। इस आरोप में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन हकीकत यह है कि चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, नियंत्रण रखने की चाह सबकी होती है। हमेशा की तरह इस बार भी सरकार ने सॉफ्टवेयर के जरिए लोगों के फोन हैक करने के दावों को गलत बताया है। एक बयान में सरकार ने कहा है कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्र आजादी के लिए प्रतिबद्ध है। यह प्रतिबद्धता किस हद तक निभाई जाती है, यह आप और हम सभी जानते हैं।

- श्याम माथुर -

अनेक पुराने और अनुपयोगी कानूनों को समाप्त करने के बावजूद आज भी हमारे देश में ऐसे कई कानून हैं जो सरकारों को नागरिकों की निजी बातचीत की जासूसी करने का पूरा अधिकार देते हैं। दरअसल लोगों की जासूसी करने के लिए एक अपारदर्शी सर्विलांस तंत्र की स्थापना की जाती है जिसका पूरा नियंत्रण सरकार के मुखिया के पास होता है और इस प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी के लिए कोई प्रावधान नहीं होते। चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, नियंत्रण रखने की चाह सबकी होती है। इसी सिलसिले में एक बार फिर यह बात सामने आई है कि इस्रायली जासूसी तकनीक के जरिए सरकार ने देश के अनेक प्रभावशाली लोगों की जासूसी की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई एक जांच में दावा किया गया है कि सरकार ने अपने लोगों की जासूसी की। इनमें भारत के कई बड़े नाम शामिल हैं। भारतीय समाचार वेबसाइट द वायर ने खबर दी है कि इस्रायल की निगरानी रखने वाली तकनीक के जरिए भारत के तीन सौ से भी ज्यादा लोगों के मोबाइल नंबरों की जासूसी की गई, जिनमें देश के मंत्रियों और विपक्ष के नेताओं से लेकर पत्रकार, जाने-माने वकील, उद्योगपति, सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, मानवाधिकार कार्यकर्ता आदि शामिल हैं।

लीक डेटाबेस पेरिस आधारित गैर-लाभकारी मीडिया संस्था फॉरबिडेन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा हासिल किया गया और इसे द वायर, ल मोंद, द गार्जियन, वाशिंगटन पोस्ट, सुडडोईच जाईटुंग और दस अन्य मेक्सिन, अरबी और लेबनानी न्यूज संगठनों के साथ पेगासस प्रोजेक्ट नाम के एक साझा तहकीकात के हिस्से के तौर पर साझा किया गया। सूची में पहचान किए गए नंबरों का अधिकांश हिस्सा भौगोलिक तौर पर 10 देशों के समूहों- भारत, अजरबैजान, बहरीन, कजाकिस्तान, मेक्सिको, मोरक्को, रवांडा, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में केंद्रित था। इस्राइल की कंपनी एनएसओ ग्रुप पेगासस सॉफ्टवेयर बेचता है। कंपनी का कहना है कि उसके ग्राहकों में सिर्फ सरकारें शामिल हैं, जिनकी संख्या 36 मानी जाती है।

पेगासस प्रोजेक्ट के तहत 15 से ज्यादा संस्थानों के पत्रकारों ने मिलकर यह खुफिया जांच की। यह जांच फ्रांस की एक गैर सरकारी संस्था फॉरबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल को मिले एक डेटा के आधार पर हुई है। इस बारे में फॉरबिडन स्टोरीज का कहना है कि उसे जो डेटा मिला था, उसमें एनएसओ ग्रुप के ग्राहकों द्वारा चुने गए फोन नंबर शामिल थे। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक में इस सूची में भारत के 40 पत्रकार, तीन बड़े विपक्षी नेता, एक संवैधानिक विशेषज्ञ, नरेंद्र मोदी सरकार के दो मंत्री, सुरक्षा संस्थानों के मौजूदा और पूर्व प्रमुख और कई उद्योगपति शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अधिकतर फोन नंबरों को 2018 से 2019 के बीच निशाना बनाया गया था। 2019 में भारत में आम चुनाव हुए थे और नरेंद्र मोदी दोबारा चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने थे।

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में आधारित डिजिटल सर्विलांस शोध संगठन सिटिजन लैब, जिसने 2019 में एनएसओ ग्रुप के खिलाफ वॉट्सऐप के कानूनी मुकदमे की जमीन तैयार की थी, के विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी देशों में 2018 में पेगासस के सक्रिय ऑपरेटर्स थे।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के तकनीकी लैब के साथ मिलकर काम करते हुए, फॉरबिडेन स्टोरीज द्वारा समन्वित 60 से ज्यादा पत्रकारों की एक टीम ने इन नंबरों वाले लोगों की पहचान और पुष्टि करने की कोशिश की। इसके बाद उनके द्वारा इस्तेमाल में लाए जा रहे फोन की फॉरेंसिक जांच करने का प्रयास किया। यह जांच डेटा में बताई गई समयावधि यानी 2017 के मध्य से जुलाई 2019 तक की अवधि के लिए की गई।

पेगासस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक 50 हजार नंबरों की एक सूची है जिसके लिए 37 स्मार्टफोन्स को निशाना बना गया। अखबार लिखता है कि ये नंबर उन देशों में से हैं, जो अपने नागरिकों की जासूसी करने के लिए जाने जाते हैं और एनएसओ ग्रुप के ग्राहक भी हैं। पूरी सूची में जो नंबर शामिल हैं उनमें से 50 देशों के एक हजार से ज्यादा लोगों की पहचान संभव हो पाई है। इन लोगों में अरब के शाही परिवार के कई सदस्य, कम से कम 65 उद्योगपति, 85 मानवाधिकार कार्यकर्ता, 189 पत्रकार और 600 से ज्यादा नेता और सरकारी अधिकारी शामिल हैं। एनएसओ ग्रुप का कहना है कि लोगों के फोन की जासूसी उसके पेगासस स्पाइवेयर लाइसेंस की शर्तों के प्रतिकूल है क्योंकि उसका सॉफ्टवेयर सिर्फ बड़े अपराधियों और आतंकवादियों की जासूसी के लिए है।

इससे पहले नवंबर, 2019 में भी व्हाट्सऐप की ओर से हमारे देश के 24 नागरिकों की जासूसी किए जाने का मामला सामने आया था। यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब व्हाट्सऐप की ओर से अमेरिका में दायर किए गए एक मुकदमे के विवरण सामने आए। व्हाट्सऐप के मालिक फेसबुक ने ये मुकदमा एक इसरायली कंपनी एनएसओ के खिलाफ दायर किया था। फेसबुक का दावा है कि इस कंपनी ने अपने एक जासूसी सॉफ्टवेयर को दुनिया भर में कम से कम 1400 लोगों के मोबाइल फोन में व्हाट्सऐप के जरिये अवैध तरीके से डाला है जिसकी वजह से वे जासूसी का शिकार हो गए।

बताया जा रहा है कि पेगासस नाम का यह सॉफ्टवेयर काफी उन्नत किस्म का है। इसे फोन में प्रवेश करने के लिए किसी लिंक पर क्लिक करने की भी आवश्यकता नहीं होती और ये मिस्ड वीडियो कॉल से भी फोन में घुस सकता है। फोन के अंदर घुस जाने के बाद यह फोन कॉल, एसएमएस, व्हाट्सऐप संदेश, ईमेल, ब्राउजर हिस्ट्री, पासवर्ड जैसी हर जानकारी चुरा सकता है। एन्क्रिप्टेड संदेश भी इससे बचे नहीं रहते और यह फोन के कैमरे और माइक को भी चला कर आस पास हो रही गतिविधियां रिकॉर्ड कर सकता है। इसके बाद सॉफ्टवेयर सारी जानकारी वाईफाई या मोबाइल इंटरनेट के जरिये फोन से बाहर भेज सकता है। यह फोन के अंदर अदृश्य रहता है, फोन को धीमा भी नहीं करता, जिससे कोई शक नहीं होता और इसमें खुद को नष्ट करने का विकल्प भी होता है।

Popular posts from this blog

जुनूनी एंकर पत्रकार रोहित सरदाना की कोरोना से मौत

'बालिका वधु' जैसे धारावाहिकों के डायरेक्टर रामवृक्ष आज सब्जी बेचने को मजबूर

'कम्युनिकेशन टुडे' ने पूरा किया 25 साल का सफ़र, मीडिया शिक्षा की 100 वर्षों की यात्रा पर विशेषांक