अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म की रस्में भी होने लगी ऑनलाइन

 -श्याम माथुर-

जयपुर। राजधानी जयपुर के तमाम मरघट इन दिनों सुबह से शाम तक आबाद नजर आते हैं। बचपन से यह उपमा सुनते आए हैं कि माहौल में मरघट जैसी वीरानी थी। पर अब मरघट में हलचल है और सड़कों पर सन्नाटा। श्मशान घाटों पर भीड़ लगी है। कोविड-19 के जिन मरीजों की मौत हो जाती है उनके अंतिम संस्कार को लेकर परिवार को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। श्मशान घाट पर टोकन लेकर परिजनों को अपने प्रियजन के अंतिम संस्कार के इंतजार में घंटों बिताने पड़ रहे हैं। जाहिर है कि श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कराना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है।

कोरोना की दूसरी लहर ने मौत का जो तांडव दिखाया है, उसमें आम इंसान ही नहीं, बल्कि अंतिम संस्कार कराने वाले पंडित-पुरोहित भी सहम गए हैं। कई बार पुरोहित नहीं होने पर क्रियाकर्म तो श्मशान घाट के कर्मचारी ही करा देते हैं। कुछ पंडित-पुरोहित ऐसे भी हैं जो अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म की रस्में भी ऑनलाइन पूरी करा रहे हैं।

जयपुर में किसी की मौत के बाद उठावने की रस्म को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ परिवार इसे तीए की बैठक भी कहते हैं। जो लोग अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पाते, वे अपनी संवेदनाएं व्यक्त करने के लिए तीए की बैठक में अवश्य पहुंचते हैं। पर कोरोना ने इन मानवीय संवेदनाओं को भी ग्रहण लगा दिया है। किसी परिचित या परिजन की मौत की खबर मिलने के बाद लोग न तो उनके अंतिम सफर में शामिल हो पा रहे हैं और न ही उठावने की बैठकों में जा सकते हैं। इस बेबसी को देखते हुए कुछ लोगों ने यहां भी टेक्नॉलॉजी का सहारा लिया है। कोरोना के कारण अब तीए की बैठकें भी ऑनलाइन तरीके से आयोजित की जा रही हैं। घर में किसी के गुजरने के बाद परिवार के युवा जूम मीटिंग ऐप या गूगल मीट ऐप का इस्तेमाल करते हुए अन्य परिजनों और परिचितों को तीए की बैठक में शामिल होने का मौका दे रहे हैं।

इस साल महामारी ने अंतिम संस्कार ही नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले हवन, गायत्री मंत्र जाप और अन्य धार्मिक आयोजनों को भी प्रभावित किया है। पीड़ित परिवार अपने पुरोहित से विचार करने के बाद सहज तरीके से धार्मिक आयोजन कर रहे हैं। कुछ श्मशान घाटों का मंजर यह है कि यहां दिन और रात चिताएं जल रही हैं और कई बार परिजन अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाते हैं। कई बार तो परिवार इस खौफ में अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होते कि कहीं वे भी संक्रमित ना हो जाएं। दूसरी ओर कुछ ऐसे युवा भी हैं जो परिवार की गैर मौजूदगी में वह काम कर रहे हैं जिसकी जिम्मेदारी परिवार के सदस्यों की होती है।

अंतिम संस्कार की क्रियाएं पूरी कराने वाले एक पुरोहित कहते हैं कि उनके पास पंडितों-ब्राह्मणों का एक बड़ा नेटवर्क है और वे परिवारों को उनकी जरूरतों के हिसाब से अपनी सेवाएं देते हैं। वे ऑनलाइन हवन से लेकर तेरहवीं तक के धार्मिक अनुष्ठान कराने का काम करते हैं। पीड़ित परिवार से पहले तो यह पूछा जाता है कि परिवार का कोई सदस्य कोरोना पॉजिटिव तो नहीं है। अगर परिवार में कोई कोरोना संक्रमित होता है तो उन्हें ऑनलाइन हवन और गायत्री मंत्र के जाप का विकल्प दिया जाता है। ऑनलाइन हवन के बारे में पुरोहित कहते हैं कि परिवार के घर पर हवन की सामग्री पहुंचाई जाती है, ताकि वह पंडित के निर्देश के मुताबिक हवन में शामिल हो सके। परिवार के सदस्य को वीडियो कॉल पर पुरोहित निर्देश देते हैं और सदस्य उसका पालन करता है।

मृत्यु के बाद होने वाले गरुड़ पुराण का पाठ भी अब ऑनलाइन होता है। पंडित-पुरोहित अपने घर से ही गरुड़ पुराण का पाठ करते हैं और गुजरने वाले शख्स के परिजन वीडियो कॉल के माध्यम से गरुड़ पुराण से जुड़ जाते हैं। कई ब्राह्मण ऑनलाइन काम करने में निपुण नहीं होते हैं, लेकिन उनके घर की युवा पीढ़ी उन्हें वीडियो कॉल करना सिखा रही है और इस तरह वे नई टेक्नॉलॉजी के सहारे गमगीन लोगों के लिए सहारा साबित हो रहे हैं।

 

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