विचारों पर निगरानी रखने की एक और कोशिश

राष्ट्र हित में सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए साइबर वॉलंटियर्स की फ़ौज खड़ी करने की तैयारी केंद्र सरकार कर रही है। सरकार ने विस्तार से इसकी जरूरत के बारे में बताया है, लेकिन साइबर कानून और निजता के अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने इस पर गहरी चिंता और आशंकाएँ जताई हैं। पहला सवाल तो यही है कि सोशल मीडिया की कोई पोस्ट देश विरोधी है या नहीं, इसका निर्णय साइबर वॉलंटियर्स कैसे कर सकते हैं। यह काम तो देश की अदालतों का है। जाहिर है कि यह एक ऐसा पेचीदा मामला है, जिस पर निर्णय करने का अधिकार कुछ लोगों के हाथों में नहीं सौंपा जा सकता है।

- श्याम माथुर -

केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में परीक्षण के तौर पर साइबर वॉलंटियर्स भर्ती करने की एक योजना शुरू की है। शुरुआती तौर पर जैसे संकेत मिल रहे हैं, उनसे पता चलता है कि ये साबइर वाॅलंटियर्स दरअसल आपकी और हमारी सोशल मीडिया गतिविधियों पर करीब से निगरानी रखेंगे और राष्ट्र हितमें सरकार के साथ मिलकर काम करेंगे। सरकार का कहना है कि अभी यह प्रोग्राम परीक्षण के तौर पर जम्मू-कश्मीर में शुरू किया गया है, वहाँ मिलने वाली रिपोर्ट के बाद उसके आधार पर ही इस प्रोग्राम पर आगे काम किया जाएगा। आने वाले समय में जाहिर है कि दूसरे राज्यों में भी साइबर वाॅलंटियर्स नजर आएंगे और सरकार को राष्ट्र हित में जरूरी सलाह देंगे। हम में से ज्यादातर लोगों को शायद इसमें कुछ भी अजीब नजर नहीं आए, और कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि यह साइबर क्राइम रोकने की दिशा में उठाया गया सरकार का एक और कदम है। लेकिन गहराई से इस योजना का अध्ययन करें, तो यह सीधे-सीधे आपकी और हमारी निजता के दायरे का उल्लंघन करते हुए सोशल मीडिया संबंधी हमारी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की तैयारी नजर आती है।



केंद्रीय गृह मंत्रालय की योजना के मुताबिक साइबर वॉलंटियर इंटरनेट पर मौजूद गैर-कानूनी और राष्ट्र विरोधी कंटेंट की पहचान करने, उसे रिपोर्ट करने और उसे साइबर नेटवर्क से हटाने में एजेंसियों की मदद करेंगे। ये साइबर वॉलंटियर्स ऐसी किसी भी सामग्री को रिपोर्ट कर सकते हैं, जो उनके हिसाब से देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ हो, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के खिलाफ हो, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था के बिगाड़ने की आशंका हो या जिससे सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा हो। ऊपरी तौर पर देखने में इसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आता। हम सभी चाहते हैं कि देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली किसी भी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए और न ही देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की अनुमति मिलनी चाहिए। लेकिन क्या सब कुछ इतना सीधा-सरल है?

आपकी और हमारी निजता के अधिकार की रक्षा के लिए लगातार लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ताओं ने इस योजना को लेकर गहरी चिंता और आशंकाएँ जताई हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि सोशल मीडिया की कोई पोस्ट देश विरोधी है या नहीं, इसका निर्णय साइबर वॉलंटियर्स कैसे कर सकते हैं। यह काम तो देश की अदालतों का है और पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब पुलिस ने किसी शख्स को उसकी कथित राष्ट्र विरोधी पोस्ट के लिए हिरासत में डाला और फिर अदालत ने उसे बाइज्जत बरी कर दिया। जाहिर है कि यह एक ऐसा पेचीदा मामला है, जिस पर निर्णय करने का अधिकार कुछ लोगांे के हाथों में नहीं सौंपा जा सकता है। हाल के दौर में हमने देखा है कि ट्विटर पर लिखे गए कुछ शब्दों के कारण प्रतिष्ठित मीडिया कर्मियों के खिलाफ राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए हैं। पिछले महीने गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसानों की ट्रैक्टर परेड और उस दौरान हुई हिंसा की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की घटनाओं को याद कर लीजिए। एक प्रदर्शनकारी की मौत से जुड़ी घटना की रिपोर्टिंग करने, घटनाक्रम की जानकारी अपने निजी सोशल मीडिया हैंडल पर तथा अपने प्रकाशनों पर देने पर पत्रकारों को खास तौर पर निशाना बनाया गया और कुछ पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह का आरोप भी लगाया गया।

जाहिर है कि वैचारिक पूर्वाग्रहों के कारण उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। ऐसे समय में जबकि देशभर का मीडिया सरकार की मंशा को ही असली पत्रकारिता समझ रहा है, वहां कुछ लोग अपने सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से लोगों के सामने सच्चाई रखने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में वे कभी भी किसी साइबर वॉलंटियर के निशाने पर आ सकते हैं। पिछले कुछ सालों से सरकार की कोशिश जारी है कि वो सोशल मीडिया की निगरानी करने के लिए एक मैकेनिज्म विकसित करे। ये वॉलंटियर वाला जो सिस्टम है, वह इसी दिशा में उठाया गया एक और कदम नजर आता है।

संविधान का अनुच्छेद 19 (2) सरकार को यह अधिकार देता है कि वह कानून के मुताबिक तर्कसंगत वजहों के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा सकती है। सरकार सोशल मीडिया पर पूरी तरह से बिना सोचे-समझे और भड़काऊ पोस्ट पर लगाम लगाने के लिए अनुच्छेद 19 (2) द्वारा दी गई शक्ति का प्रयोग कर सकती है। लेकिन आखिर यह कौन तय करेगा कि कौन-सी सोशल मीडिया पोस्ट राष्ट्र हित के खिलाफ है।

हम सब इस बात से पूरी तरह सहमत ही होंगे कि दो धार्मिक समुदायों के बीच नफरत का बीज बोने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। खास तौर पर फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय इसका जरूर ख्याल रखा जाना चाहिए। भड़काऊ पोस्ट और मैसेज सार्वजनिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए। लेकिन क्या किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के विचारों पर कड़ी पहरेदारी की इजाजत दी जानी चाहिए?

 

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