सुरों के सच्चे साधक

 - श्याम माथुर -

रियलिटी शो इंडियन आइडल’ का यह सीजन अपने पिछले सीजन से भी बेहतर है। हालांकि दूसरे तमाम रियलिटी शो की तरह यहां भी मेलोड्रामा की भरमार हैप्रतियोगियों की दुखभरी दास्तान हैंगरीब माता-पिता के ऊंचे-ऊंचे सपने हैं और इनसे भी फायदा नहीं मिलेतो दर्शकों का जज्बाती समर्थन हासिल करने के लिए आंसू बहाते जज हैं। लेकिन इस तमाम ड्रामेबाजी के बावजूद आखिर कुछ तो बात हैजो यह शो सीधे आपके दिल को छू जाता है।

अगर आप गीत और संगीत से थोड़ा सा भी लगाव रखते हैं, तो यह मुमकिन नहीं है कि आप मशहूर सिंगिंग रियलिटी शो इंडियन आइडलके बारे में जानकारी नहीं रखते हों। सोनी चैनल पर प्रसारित होने वाले इस शो का अभी 12 वां सीजन चल रहा है और जैसा कि हर बार होता है, यह सीजन अपने पिछले सीजन से भी बेहतर है। हालांकि दूसरे तमाम रियलिटी शो की तरह यहां भी मेलोड्रामा की भरमार है, प्रतियोगियों की दुखभरी दास्तान हैं, गरीब माता-पिता के ऊंचे-ऊंचे सपने हैं और इनसे भी फायदा नहीं मिले, तो दर्शकों का जज्बाती समर्थन हासिल करने के लिए आंसू बहाते जज हैं। लेकिन इस तमाम ड्रामेबाजी के बावजूद आखिर कुछ तो बात है, जो यह शो सीधे आपके दिल को छू जाता है। शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि गुजरे दौर के लोकप्रिय गीत-संगीत को यह शो कुछ इस अंदाज में पेश करता है कि मुंह से वाहही निकलती है। इस शो में हर बार ऐसे नवोदित कलाकारों को मंच मिलता है, जो सुरों की सच्ची साधना करने में यकीन करते हैं। इस बार भी देशभर से ऐसे हुनरमंद नौजवान कलाकार चुने गए हैं, जिनके बारे में यह तय करना वाकई मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर गा रहा है।



कच्ची उम्र के इन नौजवान गायक-गायिकाओं में राजस्थान के नागौर में रहने वाले सवाई भाट भी हैं, तो मुजफ्फरनगर के मोहम्मद दानिश, कोलकाता की अरुणिता कांजीलाल, उत्तराखंड में चंपावत के पवनदीप राजन, अहमदनगर की अंजलि गायकवाड़, मुंबई की सयाली कांबले और पुणे के आशीष कुलकर्णी समेत कुल तेरह कलाकार सुरों के अखाड़े में अपनी-अपनी गायकी का दांव चल रहे हैं। पंद्रह से बीस-बाईस साल की उम्र वाले ये कलाकार अपनी गायकी के दम पर निर्णायकों और दर्शकों को निरंतर चैंका रहे हैं। हिंदुस्तानी सिनेमा के बेहतरीन, लेकिन मुश्किल समझे जाने वाले गानों को भी ये कलाकार इतनी नफासत से गा रहे हैं कि आप भले ही सुरों की बारीकियों की समझ नहीं रखते हों, फिर भी आपको यह अहसास होगा कि टेलीविजन के पर्दे पर जो कलाकार नजर आ रहा है, उसके सुरों में सच्चाई है। इस शो में निर्णायक की भूमिका निभाने वाले संगीतकार विशाल ददलानी ने तो पिछले हफ्ते साफ तौर पर स्वीकार किया कि जैसे-जैसे शो आगे बढ़ रहा है, उन्हें इस बात की टेंशन होने लगी है कि वे किसे चुनेंगे और किसे बाहर का रास्ता दिखाएंगे।

टेंशन होना स्वाभाविक भी है। हर कलाकार पिछले प्रतियोगी से बेहतर गायकी पेश कर रहा है, हाई पिच के गानों को भी सारे प्रतियोगी बड़ी आसानी से और बेहद खूबसूरती के साथ गा रहे हैं, वे सिर्फ पुराने गानों की नकल नहीं कर रहे हैं, बल्कि इनमें अपनी ओर से भी इंप्रोवाइजेशन कर रहे हैं, जिसे हम लोग तकनीकी भाषा में वैल्यू एडिशन भी कह सकते हैं। इस तरह के नए प्रयोगों से सुरों का यह मैदान और सुरीला हो गया है।

एक बात और। इंडियन आइडलजैसे टैलेंट हंट शो ने ऐसे तमाम लोगों को एक नया प्लेटफार्म मुहैया कराया है, जो अब तक गुमनामी का जीवन जी रहे थे या जिनके पास अपनी कला को लोगों तक पहुंचाने का कोई प्रभावी जरिया नहीं था। किसने सोचा था कि नागौर के आसपास के गांवों में अपने मां-बाप के साथ कठपुतली का शो करने वाले और बदहाल सी एक झौपड़ी में गुजर-बसर करने वाले सवाई भाट को इतने बड़े प्लेटफार्म पर अपनी आवाज का जादू बिखेरने का मौका मिलेगा। खास बात यह है कि आज तक उन्होंने गायकी की कोई भी फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली है, फिर भी जब सवाई भाट स्टेज पर आते हैं, तो अच्छे-अच्छे उस्ताद गायक भी हैरान रह जाते हैं।

हाल ही अपने एक इंटरव्यू में सवाई भाट ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि उन्होंने न तो कभी स्कूल-काॅलेज का मुंह देखा है और न ही उन्होंने संगीत की कोई डिग्री ली है। जैसलमेर में रहने वाली मांगणयार कम्युनिटी के लोगों की गायकी को सुनकर सवाई भाट ने अपनी गायकी को चमकाया और इस तरह अपना घर भी चलाया। फिर अपनी आंखों में कुछ रूपहले सपने लेकर सवाई ने इंडियन आइडल का रुख किया और आज शायद उन्हें लगता होगा कि उनके सपनों को साकार करने की वेला आ गई है। हालांकि यह सब कुछ इतना आसान भी नहीं था। जैसा कि वे कहते हैं, ‘‘काफी लोग यह सोचते थे कि यह कभी अच्छा सिंगर नहीं बन सकता। सबको लगता था कि बस ये गली-गली में गांव-गांव जाकर मांगता रहेगा हमेशा। लेकिन सरस्वती माता की देन थी और मैं थोड़ा अच्छा गा भी लेता था। तो सरस्वती माता की देन हुई और भगवान का आशीर्वाद हुआ कि उन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया।’’

भगवान का यही आशीर्वाद शायद नेहा कक्कड़ पर भी रहा, तभी तो यह मुमकिन हुआ है कि जिस प्लेटफार्म पर वे कभी एक प्रतियोगी के रूप में शामिल हुई थीं, आज उसी मंच पर वे एक जज की भूमिका में नजर आ रही हैं। वर्ष 2008 में नेहा इंडियन आइडल-2 में एक कंटेस्टेंट बनकर आई थीं, लेकिन तब वे खिताब जीतने में नाकाम रही थीं। लेकिन अपने जज्बे को कायम रखते हुए नेहा ने सुरों की दुनिया में आहिस्ता-आहिस्ता अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी इसी तपस्या का नतीजा है कि नेहा कक्कड़ को इंडियन आइडल के सीजन 10 में निर्णायक बनने का अवसर मिला और इसके बाद सीजन 11 और अब सीजन 12 में भी वे प्रतियोगियों की गायकी को जज कर रही हैं।

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