घूसखोरी में हम फिर बने नंबर वन!

- श्याम माथुर -

देखा जाए तो भ्रष्टाचार से जुड़ी कोई भी रिपोर्ट अब हमें इतना नहीं चैंकाती, क्योंकि हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार अब एक सामान्य शिष्टाचार की शक्ल ले चुका है और शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा, जिसने कभी भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लिया होगा।

भ्रष्ट आचरण की निगरानी करने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पिछले हफ्ते जारी नई रिपोर्ट के अनुसार एशिया में सबसे ज्यादा रिश्वत की दर हमारे देश है और हमारे यहां सार्वजनिक सेवाओं का उपयोग करने के लिए व्यक्तिगत कनेक्शन का उपयोग करने वालों की संख्या सबसे अधिक है। रिपोर्ट उस सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसे इस वर्ष 17 जून से 17 जुलाई के बीच आयोजित किया गया था। देखा जाए तो भ्रष्टाचार से जुड़ी कोई भी रिपोर्ट अब हमें इतना नहीं चैंकाती, क्योंकि हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार अब एक सामान्य शिष्टाचार की शक्ल ले चुका है और शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा, जिसने कभी भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लिया होगा।


रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अन्य सरकारी विभागों की तुलना में पुलिस में सबसे ज्यादा घूसखोरी है। सर्वे में शामिल लोग, जिनका कभी पुलिस से पाला पड़ा, उनमें से 42 फीसदी लोगों को पुलिस को रिश्वत देनी पड़ी। 41 प्रतिशत लोगांे ने कहा कि पहचान पत्र जैसे आधिकारिक कागजात प्राप्त करने के लिए रिश्वत बड़े पैमाने पर माँगी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस में काम कराने के लिए व्यक्तिगत संबंधों से काम कराने के 39 प्रतिशत मामले आए। आपको बता दें कि वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम में जनवरी में दावोस में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत को भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में 180 देशों में 80वें स्थान पर रखा गया था।

‘ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर- एशिया‘ नाम से जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट के लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने 17 एशियाई देशों में 20,000 लोगों का सर्वे किया। यह सर्वे इसी वर्ष जून-सितंबर के बीच किया गया। सर्वे में शामिल किए गए लोगों से पिछले 12 महीनों में भ्रष्टाचार के बारे में उनकी धारणा और अनुभव पूछे गए। इसमें पुलिस, अदालतें, सार्वजनिक अस्पताल, पहचान दस्तावेज की प्राप्ति और उपयोगी सुविधाओं सहित रिपोर्ट में छह प्रमुख सार्वजनिक सेवाएँ शामिल की गई थीं। व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर सार्वजनिक साधनों और संसाधनों के इस्तेमाल करने का मामला भी एशिया में सबसे ज्यादा भारत में 46 फीसदी है। यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार है, क्योंकि किसी अन्य के हक को मारकर ताकतवर लोग अपने सगे-संबंधी को सुविधाएँ मुहैया करा देते हैं। 

लगे हाथों आपको यह भी बता दें कि एशिया के सबसे ईमानदार देशों में मालदीव और जापान पहले नंबर पर आते हैं। इसके बाद दक्षिण कोरिया, हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में भारत के बाद सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार कंबोडिया और इंडोनेशिया में है। भारत में जहाँ भ्रष्टाचार की दर 39 है, वहीं कंबोडिया में 37 फीसदी और इंडोनेशिया में 30 फीसदी है, जबकि मालदीव और जापान में सबसे कम रिश्वत दर (2 प्रतिशत) है। 

रिपोर्ट कहती है कि भारत में 89 प्रतिशत लोगों को लगता है कि सरकारी भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है और 18 प्रतिशत ने वोट के बदले रिश्वत की पेशकश को स्वीकार किया। सर्वेक्षण में कहा गया है कि लगभग 63 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकार भ्रष्टाचार से निपटने में अच्छा काम कर रही है, जबकि 73 प्रतिशत लोगों ने कहा कि सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही है। लोग साफ कहते हैं कि धीमी और जटिल नौकरशाही प्रक्रिया, अनावश्यक लालफीताशाही और अस्पष्ट नियमों के कारण नागरिकों को भ्रष्टाचार के नेटवर्क के माध्यम से बुनियादी सेवाओं तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक समाधान निकालने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

दरअसल हमारे देश में भ्रष्टाचार एक विकराल समस्या बन चुका है। भ्रष्टाचार के जो बड़े मामले सामने आते हैं उनमें आम नागरिक का जीवन उतना प्रभावित नहीं होता, हालांकि देश के खजाने को चूना जरूर लगता है, लेकिन जो छोटे भ्रष्टाचार हैं जैसे कोई सेवा या फिर सरकारी विभाग से प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए जब रिश्वत देनी पड़ती है, तो आम नागरिक का जीवन सीधे तौर पर प्रभावित होता है। हमारे देश में रिश्वत मांगना ही नहीं, बल्कि देना भी अपराध है, लेकिन मजबूरन लोग घूस दे देते हैं।

अहम सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के इस दलदल से आखिर मुक्ति कैसे मिले? क्या यह काम सिर्फ सरकार के भरोसे किया जा सकता है? शायद नहीं, पर इतना जरूर है कि इस कलंक से छुटकारा पाने की दिशा में सबसे अहम भूमिका सरकारी स्तर पर ही हो सकती है। कुछ सुझाव-

- देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कानून तो हैं, लेकिन जागरूकता की कमी है। निचले स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

- लोग पुलिस और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाने से बचते हैं। पुलिस विभाग से जुड़े मामलों में लोग सामने नहीं आना चाहते, उनके मन में खौफ होता है, डर के ऐसे माहौल को विभाग ही खत्म कर सकता है।

- राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई है, ऐसे में भ्रष्टाचार पर सख्ती की कमी बनी रहती है।

- राष्ट्रीय और राज्य सरकारों को सार्वजनिक सेवाओं के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना चाहिए।

- आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं को जल्दी और प्रभावी ढंग से वितरित करने के लिए लोगांे के अनुकूल ऑनलाइन प्लेटफार्म लाॅन्च किए जा सकते हैं।

- ज्यादातर नागरिकों का मानना है कि यदि वे भ्रष्टाचार की रिपोर्ट करते हैं, तो उन्हें प्रतिशोध का सामना करना पड़ता है। प्रभावी पुलिस तंत्र के माध्यम से इस खौफ को दूर करने की जरूरत है।


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