दर्शकों के लिए सड़कछाप लड़ाई का नजारा पेश कर रहे हैं टीवी न्यूज एंकर

अभिनेता सुशांतसिंह राजपूत की मौत के मामले में सबसे पहले कवरेज दिखाने की होड़ में मुंबई में पिछले दिनों टीवी पत्रकार आपस में ही भिड़ गए। आम तौर पर मीडिया की आजादी की आवाज बुलंद करने वाले ये पत्रकार एक दूसरे के साथ हाथापाई करने लगे और इस बीच एक ने दूसरे को थप्पड़ जड़ दिया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ और अब लोग यह सवाल करने लगे हैं कि आखिर ऐसी क्या स्थिति हो गई कि इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के लोग आपस में ही मारपीट करने लगे हैं।
बहुत सारे लोगों का मानना है कि यह सारा खेल टीआरपी की वजह से हो रहा है। लंबे समय तक सास-बहू मार्का पारंपरिक धारावाहिक या नागिन जैसे अजीबोगरीब शो टीआरपी हथियाने का जरिया बने रहे, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। अब समाचार और समाचार आधारित कार्यक्रम टीआरपी का माध्यम बन गए हैं। कहा जा सकता है कि टीआरपी की होड़ मनोरंजन चैनलों से खिसककर न्यूज चैनलों के पास आ गई है। लगातार चीखने और चिल्लाने को ही न्यूज मानने वाले टीवी एंकर अपनी जोकराना हरकतों से दर्शकों को अपने पाले में रखने की भरसक कोशिश करते नजर आ रहे हैं। कोई भी न्यूज चैनल चला लीजिए, गला फाड़-फाड़कर चीखने वाले टीवी एंकर खुद को दुनिया का सबसे बड़ा जज साबित करने नजर आ जाते हैं। टेलीविजन के प्राइम टाइम को न्यूज एंकरों ने किडनैप कर लिया है और अपने स्टूडियो में बैठकर ये एंकर किसी गली-मुहल्ले के चैराहे पर होेने वाली सड़कछाप लड़ाई का नजारा दर्शकों के लिए पेश कर रहे हैं। 



बॉलीवुड अभिनेता सुशांतसिंह राजपूत की संदिग्ध मौत के मामले के बाद टीवी न्यूज चैनलोें का एक कुत्सित और वीभत्स रूप हम सबने देखा है। लगभग हर चैनल ने इस घटना को अपने-अपने तरीके से भुनाने का प्रयास किया और सबने अपने-अपने फायदे के लिए सुशांत की मौत का इस्तेमाल किया। इसी दौरान जब सुशांत सिंह की मौत के मामले की जांच ड्रग्स एंगल से की जाने लगी, तो न्यूज एंकरों को और मजेदार मसाला मिल गया। ड्रग्स एंगल में बॉलीवुड के बड़े-बड़े नाम सामने आने लगे और उन पर ड्रग्स लेने के आरोप लगे और सितारों की पेशी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दफ्तरों में होने लगी, तो फिर उनकी कवरेज को लेकर चैनलों में मानो कोहराम मच गया। पत्रकारिता के तमाम आदर्शों को दरकिनार करते हुए टीवी संवाददाता अपने-अपने नजरिये से इस घटनाक्रम को पेश करते रहे। मुंबई में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के दफ्तर के बाहर डटे मीडिया कर्मियों में एक अजीबोगरीब होड़ नजर आने लगी और इसी होड़ में एक चैनल के रिपोर्टर ने दूसरे मीडिया कर्मी पर हाथ उठा दिया। सबसे पहले और सबसे तेजी से खबरें पहुंचाने की होड़ में थप्पड़ कांड हो गया।
सच्चाई यह है कि बाजार का दबाव चैनलों पर बहुत ज्यादा है। दरअसल झगड़े की असली वजह तेजी से खबर पहुंचाने की तो थी ही साथ ही टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स पाने की भी है। सबसे अधिक टीआरपी पाने वाले चैनल को ही कंपनियां विज्ञापन देना चाहती हैं। और टीआरपी की यही होड़ टीवी संवाददाताओं के बीच लड़ाई की वजह बन गई है। इसके कारणों की तलाश अधिक मुश्किल नहीं है। 
वर्ष 2020 के पहले छह महीनों में टेलीविजन दर्शकों की संख्या एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में नौ फीसदी बढ़ी है। टीवी देखने का औसत समय 3 घंटे 46 मिनट से बढ़कर 4 घंटे से अधिक हो गया। फिर भी देश के शीर्ष पांच प्रसारण नेटवर्कों की दर्शक हिस्सेदारी घटी है। करीब 18,000 करोड़ रुपए आकार वाले नेटवर्क स्टार इंडिया की हिस्सेदारी वर्ष 2019 के 19 फीसदी से घटकर 2020 के पहले सात महीनों में 16 फीसदी पर आ गई। स्टार की मालिकाना हक वाली कंपनी फॉक्स के डिज्नी द्वारा पिछले साल हुए अधिग्रहण ने इसे काफी हद तक बचा लिया। डिज्नी इंडिया और स्टार के साथ आने के बाद भारत के सबसे बड़े प्रसारक ने कमोबेश पिछले स्तर को बरकरार रखा है। करीब 8,130 करोड़ रुपए वाला जी नेटवर्क भी पिछले साल के 18.7 फीसदी से गिरकर 17.2 फीसदी पर आ गया है। इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि मनोरंजन चैनलों के दर्शक घटने लगे हैं, लेकिन न्यूज चैनलों के पास अब पहले से ज्यादा दर्शक हैं।
करीब 79,000 करोड़ रुपए के आकार वाले भारतीय प्रसारण उद्योग की शीर्ष पांच कंपनियों के दर्शकों और राजस्व का बड़ा हिस्सा मनोरंजन से आता है। लॉकडाउन और कोविड महामारी के प्रभाव से रोजाना प्रसारित होने वाले सीरियल, रियलिटी शो और दर्शकों को बांधे रखने वाले तमाम कार्यक्रम नदारद हो गए। ऐसी स्थिति में भी टीवी के दर्शक बढ़ गए, तो इसका सीधा-सा मतलब है कि वे समाचार कार्यक्रम देखने लगे, जबकि समाचार टीवी पर प्रोग्रामिंग के सबसे घटिया रूप माने जाते हैं। 
इधर टीवी न्यूज चैनल एक-दूसरे को नीचा दिखाने की भी भरसक कोशिश कर रहे हैं। इस चक्कर में वे खुद को ही बेवकूफ साबित कर रहे हैं। ‘एक्सक्लूसिव‘ और ‘सुपर एक्सक्लूसिव‘ का ठप्पा लगाकर तस्वीरें दिखाने वाले न्यूज चैनल यह भी नहीं देख पाए कि वहीं तस्वीरें दूसरे तमाम चैनलों पर भी नजर आ रही हैं। एक जैसी तस्वीरें, एक जैसा कवरेज, कुछ भी नयापन नहीं- फिर भी सुपर एक्सक्लूसिव! शायद यही कारण है कि आज टीवी न्यूज चैनलों पर लोग मुश्किल से ही भरोसा करते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि भरोसे और विश्वसनीयता के मामले में आज भी प्रिंट मीडिया का दर्जा सबसे ऊपर है। ऐसी सूरत में टीवी चैनलों में जमे पत्रकारों और संपादकों के सामने यह गंभीर और महत्वपूर्ण चुनौती है कि टीवी माध्यम की विश्वसनीयता को कैसे कायम रखें और कैसे लोगों के भरोसे को फिर से अर्जित करें।


 


 


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