मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया का संयोजन एक खतरनाक कॉकटेल बना

नई दिल्ली। आपराधिक मामलों और अदालतों में चल रहे मामलों की जांच को ‘प्रभावित’ करने के लिए मीडिया की आलोचना करते हुए कई वकीलों ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया का संयोजन एक खतरनाक कॉकटेल बन गया है, जिससे कानून के शासन के लिए प्रतिकूल माहौल बन गया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार को राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर के पहले संस्करण को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, ‘आज मीडिया ने खुद को एक सार्वजनिक अदालत में तब्दील कर दिया है।’



अपने संबोधन में वकील हरीश साल्वे ने कहा कि मीडिया की उन मामलों में भूमिका है जहां राजनीतिक हस्तक्षेप या पुलिस की उदासीनता के कारण प्रणाली विफल हो जाती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब मीडिया शोर का शासन चलाने वाली समानांतर व्यवस्था बन जाती है, जहां शोर के नियम कानून के शासन की जगह लेना शुरू कर देता है। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि वह समय बहुत दूर नहीं जब ‘मौखिक आतंकवाद, दृश्यात्मक अतिवाद और कंटेंट कट्टरवाद’जैसे अपराधों का आविष्कार करने की आवश्यकता होगी। वरिष्ठ वकील सी. आर्यमा सुंदरम ने कहा कि लोकतंत्र के तीन अन्य संस्थाओं की विफलता के कारण जनमत मीडिया को सुन रहा है। सिब्बल ने कहा कि नया मीडिया मान लेता है कि किसी ने कोई अपराध किया है और चाहता है कि पीड़ित अपनी बेगुनाही साबित करे। वाजिब संदेह के मानकों की जगह दोष के अनुमान ने ले ली है, जिसका कोई मानक नहीं है। उन्होंने कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सनसनी के कारण देश के टेलीकॉम सेक्टर में गिरावट आई है। न्यायाधीश भी इंसान हैं और अदालतों के बाहर जो कुछ भी होता है उससे उनके प्रभावित होने की संभावना है।


साल्वे ने कहा, ‘हाई प्रोफाइल मामलों में भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली तमाशा बन जाती है। अधिकतर मामलों में हमारी एजेंसियां जांच नहीं कर पाती हैं। … तो मुझे नहीं लगता कि मीडिया किसी भी ऐसी बात को मानता है जिसे सबूत का कानून कहा जाता है। कानून द्वारा संचालित सुनवाई को शर्मिंदगी की सुनवाई द्वारा बदल दिया गया है।’ उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों की चयनात्मक ढंग से लीक सूचना को सुर्खियों में लाया जाता है और फिर शाम को मीडिया चैनलों पर चार-पांच विशेषज्ञ जूरी होते हैं जो दोष के निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं और अभियुक्तों को दोषी मान लेते हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत में प्रतिष्ठा कोई मायने नहीं रखती। आप पारदर्शिता के नाम पर लोगों के व्यक्तिगत जीवन में कूदते हैं, उन्हें तरह-तरह के नामों से बुलाते हैं। अगर भारत को एक गंभीर गणराज्य बनना है तो इस प्रणाली को रोकना होगा।’


साल्वे के अनुसार, अदालतों को तब आने की जरूरत है जब मीडिया चैनल अदालतों के सामने लंबित मामलों में जनता की राय के लिए अभियान चलाना शुरू कर दें। सिंघवी ने कहा कि दर्शकों की संख्या यानी व्यूअरशिप, रेटिंग गेम और राजस्व एक विषाक्त त्रिकोण बन गया है और सामान्य तौर पर समाज को इस पूरे खेल में छूट नहीं दी जा सकती है। भारत में संस्थानिक विफलता की बात करते हुए सुंदरम ने कहा, ‘मीडिया एक जनता की अदालत बन गया है और उसने खुद को जनता की अदालत के रूप में चित्रित करना शुरू कर दिया है। मीडिया ऐसा कर रहा है क्योंकि जनता ने कहीं और देखने का विश्वास खो दिया है।’


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