क्या हमें डिजिटल मीडिया के इस्तेमाल की तमीज है ?

शायद ही कोई शख्स इस बात से इनकार करेगा कि डिजिटल मीडिया प्लेटफाॅर्म का उपयुक्त और उचित इस्तेमाल करना हमने अभी तक नहीं सीखा है। आज ज्यादातर ऐसे प्लेटफाॅर्म अधकचरी और वाहियात जानकारियों से अटे पड़े हैं और इनमें रोज इजाफा होता रहता है। इस तरह हमने अपनी नादानी और बचकानेपन से सरकार को भी एक और मौका दे दिया है। कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले चंद महीनों में सरकार सुप्रीम कोर्ट का साथ लेकर मीडिया के लिए कोई नया कानून बना डाले।

डिजिटल मीडिया कितनी तेजी से और किस हद तक हमारे बीच अपनी ‘घुसपैठ‘ बना चुका है, इस बारे में किसी को अगर कोई संदेह हो, तो उसे केंद्र सरकार के उस हलफनामे को पढ़ना चाहिए, जो उसने पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट मंे पेश किया है। इस हलफनामे में केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट हमारे देश में मीडिया के लिए कोई नियम-कायदे बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले डिजिटल मीडिया के लिए नियम बनाने चाहिए, क्योंकि ‘यह बहुत तेजी से लोगों के बीच पहुंचता है और वॉट्सएप, ट्विटर तथा फेसबुक जैसी एप्लिकेशंस के चलते किसी भी जानकारी के वायरल होने की संभावना रहती है।‘ अब तक जो लोग डिजिटल मीडिया को गंभीरता से नहीं ले रहे थे, उनके लिए सरकार का यह हलफनामा आंखें खोल देने वाला हो सकता है। सरकार ने यह हलफनामा सुदर्शन न्यूज चैनल के एक प्रोग्राम पर पाबंदी लगाने से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया। 



सूचना-प्रसारण मंत्रालय की ओर से दायर जवाबी हलफनामे में डिजिटल मीडिया को समानांतर मीडिया कहते हुए कहा गया, ‘अगर न्यायालय कोई फैसला लेता है तो यह पहले डिजिटल मीडिया के संदर्भ में लिया जाना चाहिए, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया से संबंधित पर्याप्त रूपरेखा एवं न्यायिक निर्णय पहले से मौजूद हैं।’ सरकार के इस हलफनामे में वेब आधारित समाचार प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म की तरफ भी संकेत किए गए हैं और यह बताने की कोशिश की गई है कि सूचनाओं के प्रवाह के मामले में डिजिटल मीडिया बड़ी तेजी से काम करता है और किसी हद तक यह सही भी है। इत्तफाक से हमारे देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो डिजिटल मीडिया (जिसमें वॉट्सएप भी शामिल है) पर प्रसारित बातों पर आंख मूंदकर यकीन कर लेते हैं। लगभग हर रोज वॉट्सएप पर सैकड़ों की संख्या में मैसेज इधर से उधर भेजे जाते हैं और अनेक बार ऐसा होता है कि आपने कोई मैसेज फाॅरवर्ड किया और कुछ ही देर में वही मैसेज बूमरैंग की तरह लौटकर आपके पास वापस आ गया। इन तमाम संदेशों में सच्चाई का अंश कितना होता है, यह एक अलग अध्ययन का विषय है। फिलहाल हमें इस बात को समझना होगा कि डिजिटल मीडिया का असर इतना जबरदस्त है कि केंद्र सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने गुहार लगानी पड़ी कि संभव हो, तो इसके लिए कानून बनाइए।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि मुख्यधारा के मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट) में किसी सामग्री का प्रकाशन, प्रसारण एक बार ही होता है, वहीं डिजिटल मीडिया की व्यापक पाठकों/दर्शकों तक पहुंच तेजी से होती है तथा वॉट्सऐप, ट्विटर और फेसबुक जैसी कई इलेक्ट्रॉनिक एप्लिकेशंस की वजह से जानकारी के वायरल होने की भी संभावना होती है। ऐसे में निश्चित ही यह सवाल बड़ा अहम हो जाता है कि क्या देश और समाज के हित में डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण किया जाना चाहिए? कहीं ऐसा करने से बोलने और विचार व्यक्त करने की हमारी आजादी तो प्रभावित नहीं होगी?
दरअसल जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने 15 सितंबर को सुदर्शन टीवी के प्रोग्राम ‘बिंदास बोल’ की दो कड़ियों के प्रसारण पर दो दिन के लिए रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा कि पहली नजर में ये मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने वाले प्रतीत होते हैं। शो पर रोक लगाते हुए शीर्ष अदालत ने भारत को विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों, धर्मों और भाषाओं के विविधताओं वाला देश करार देते हुए कहा था कि एक धार्मिक समुदाय को अपमानित करने के किसी प्रयास को संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक के तौर पर इस अदालत द्वारा गंभीर अनादर के रूप में देखा जाना चाहिए। पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान सुझाव दिया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्व-नियमन में मदद के लिए एक समिति गठित की जा सकती है।
आपको बता दें कि ‘बिंदास बोल’ प्रोग्राम के एक एपीसोड के ट्रेलर में चैनल ने ‘हैशटैग यूपीएससी जिहाद‘ लिखकर ‘नौकरशाही में मुसलमानों की घुसपैठ के षड्यंत्र का बड़ा खुलासा‘ करने का दावा किया था। इस शो का प्रसारण 28 अगस्त को रात आठ बजे होना था, लेकिन जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने उसी दिन इस पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 9 सितंबर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चैनल को कार्यक्रम के प्रसारण की अनुमति दे दी थी, जिसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे नोटिस भेजा था, लेकिन प्रसारण रोकने से इनकार कर दिया था। फिर इस कार्यक्रम के प्रसारण के बारे में शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई।
शीर्ष अदालत ने कार्यक्रम को लेकर की शिकायत पर सुनवाई करने के दौरान कहा कि चैनल खबर दिखाने को अधिकृत हैं, लेकिन ‘पूरे समुदाय की छवि नहीं बिगाड़ सकता और इस तरह के कार्यक्रम कर उन्हें अलग-थलग नहीं कर सकता।‘ मामले की सुनवाई कर रही पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने सवाल उठाया, ‘क्या मीडिया को एक पूरे समुदाय को निशाना बनाने की अनुमति दी जा सकती है?’ न्यायालय ने कहा, ‘बोलने की आजादी नफरत में तब्दील हो गई है।‘ देश की शीर्ष अदालत जब ऐसा कहती है, तो हमें इसके अर्थों को ईमानदारी से समझना चाहिए। शायद ही कोई शख्स इस बात से इनकार करेगा कि डिजिटल मीडिया प्लेटफाॅर्म का उपयुक्त और उचित इस्तेमाल करना हमने अभी तक नहीं सीखा है। आज ज्यादातर ऐसे प्लेटफाॅर्म अधकचरी और वाहियात जानकारियों से अटे पड़े हैं और इनमें रोज इजाफा होता रहता है। सूचनाओं के इस राजमार्ग पर मानो एक अजीब-सी होड़ मची है और आगे निकलने की आपाधापी में हमने खुद का बहुत नुकसान कर डाला है। इस होड़ के कारण नफरत और वैमनस्य का जो जहर हम फैला रहे हैं, उसने एक पूरी पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर दिया है। इस तरह हमने अपनी नादानी और बचकानेपन से सरकार को भी एक और मौका दे दिया है। कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले चंद महीनों में सरकार सुप्रीम कोर्ट का साथ लेकर मीडिया के लिए कोई नया कानून बना डाले।


 


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