केबीसी जीता और करोड़पति बनते ही शुरू हुआ बुरा दौर, लोगों ने भी खूब ठगा

मुंबई।  कौन बनेगा करोड़पति जल्दी ही अपने 12वें सीजन के साथ टीवी पर वापसी कर रहा है। शो के होस्ट अमिताभ बच्चन ने शो के लॉन्च के लिए शूटिंग शुरू कर दी है। कोरोनावायरस  के मद्देनजर शो के फॉर्मेट में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं क्योंकि इस बार शो में लाइव दर्शक नहीं होंगे। शो में चार लाइफलाइन दी जाती है। जिनमें 50 – 50, फोन ए फ्रेंड, ऑडिएंस पोल और एक्सपर्ट एडवाइस शामिल हैं। ऑडियंस पोल को दर्शकों के अभाव में किसी अन्य लाइफलाइन से रिप्लेस किया जा सकता है। इसी बीच केबीसी 5 के विजेता रहे सुशील कुमार ने फेसबुक पर अपने संघर्ष की कहानी बताई। उन्होंने लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखकर बताया कि सेलिब्रिटी बनने के बाद उनकी जिंदगी का सबसे बुरा दौर शुरू हुआ था।



सुशील ने पोस्ट शेयर करते हुए लिखा- 2011 में केबीसी जीतने के बाद मेरी जिंदगी का सबसे बुरा समय शुरू हुआ था। 2015-2016 मेरे जीवन का सबसे चुनौती पूर्ण समय था, कुछ समझ नहीं रहा था क्या करें। लोकल सेलेब्रिटी होने के कारण महीने में दस से पंद्रह दिन बिहार में कहीं न कहीं कार्यक्रम लगा ही रहता था। इसलिए पढ़ाई लिखाई धीरे-धीरे दूर होती गई। सुशील ने बताया- उस समय मीडिया को लेकर मैं बहुत ज्यादा सीरियस रहा करता था और मीडिया भी पूछता  कि आप क्या कर रहे हैं। इसको लेकर मैं बिना अनुभव के कभी ये बिजनेस कभी वो करता था ताकि मैं मीडिया को बता सकूं कि मैं बेकार नहीं हूं। इसका नतीजा यह होता था कि बिजनेस कुछ दिन बाद डूब जाता था।


उन्होंने आगे लिखा- केबीसी के बाद मैं दानवीर बन गया था और मुझे गुप्त दान का चस्का लग गया था। महीने में लगभग 50 हजार रुपए से ज्यादा ऐसे ही कामों में चले जाते थे। इस कारण कुछ चालू टाइप के लोग भी जुड़ गए थे और मुझे ठग कर चले जाते थे। उन्होंने आगे लिखा- केबीसी के बाद मैं दानवीर बन गया था और मुझे गुप्त दान का चस्का लग गया था। महीने में लगभग 50 हजार रुपए से ज्यादा ऐसे ही कामों में चले जाते थे। इसका असर परिवार पर भी पड़ा, जिसके बारे में सुशील ने बताया कि पत्नी के साथ भी संबंध खराब होते गए। वो अक्सर कहा करती थी कि आपको सही गलत लोगों की पहचान नहीं है और भविष्य की कोई चिंता नही है। ये सब बात सुनकर मुझे लगता था कि वो मुझे नहीं समझ पा रही है। इस बात पर खूब झगड़ा होता था।


उन्होंने ये भी माना कि इसके साथ कुछ अच्छी चीजें भी हो रही थी। दिल्ली में मैंने कुछ कार लेकर अपने एक मित्र के साथ चलवाने लगा था, जिसके कारण मुझे लगभग हर महीने कुछ दिनों दिल्ली आना पड़ता था। इसी क्रम में मेरी पहचान जामिया मिलिया में मीडिया की पढ़ाई कर रहे लड़कों से हुई, फिर आईआईएमसी में पढ़ाई कर रहे लड़के और फिर जेएनयू में रिसर्च कर रहे लड़के से। कुछ थिएटर आर्टिस्ट से भी पहचान बढ़ी। जब ये लोग किसी विषय पर बात करते थे तो मुझे लगता था कि मैं तो कुंए का मेढ़क हूं। मैं तो बहुत चीजों के बारे में जानता ही नहीं। इन सब चीजों के साथ मुझे शराब और सिगरेट की लत भी लग गई।


उन्होंने बताया कि कैसे आई कंगाली की खबर। सुशील ने लिखा- उस रात प्यासा फिल्म देख रहा था और उस फिल्म का क्लाइमेक्स चल रहा था जिसमें गुरुदत्त साहब कर रहे हैं कि मैं वो विजय नही हूं वो विजय मर चुका। उसी वक्त पत्नी कमरे में आई और चिल्लाने लगी कि एक ही फिल्म बार-बार देखने से आप पागल हो जाएंगे और यही देखना है तो मेरे रूम में मत रहिए, जाइए बाहर। लैपटॉप को बंद किया और मोहल्ले में चुपचाप टहलने लगा।


'अभी टहल ही रहा था तभी एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार का फोन आया और कुछ देर तक मैंने ठीक ठाक बात की। बाद में उन्होंने कुछ ऐसा पूछा जिससे मुझे चिढ़ हो गई और मैंने कह दिया कि मेरे सभी पैसे खत्म हो गए और दो गाय पाले हुए हैं उसी का दूध बेचकर गुजारा करते हैं। उसके बाद जो उस न्यूज का असर हुआ उससे आप सभी तो वाकिफ होंगे ही। उस खबर ने अपना असर दिखाया, जितने चालू टाइप के लोग थे वे अब कन्नी काटने लगे। मुझे लोगों ने अब कार्यक्रमों में बुलाना बंद कर दिया और तब मुझे समय मिला की अब मुझे क्या करना चाहिए'।


सुशील ने बताया कि इसी बीच एक दिन पत्नी से खूब झगड़ा हुआ और वो मायके चली गई। बात तलाक तक पहुंच गई। तब मुझे ये अहसास हुआ कि अगर रिश्ता बचाना है तो मुझे बाहर जाना होगा और फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर चुपचाप बिल्कुल नए परिचय के साथ मैं आ गया। अपने एक परिचित प्रोड्यूसर मित्र से बात करके जब मैंने अपनी बात कही तो उन्होंने फिल्म संबंधी कुछ टेक्निकल बातें पूछी, जिसको मैं नहीं बता पाया। एक बड़े प्रोडक्शन हाउस में आकर काम करने लगा। वहां पर कहानी, स्क्रीन प्ले, डायलॉग कॉपी, प्रॉप कॉस्टयूम और न जानें क्या करने, देखने, समझने का मौका मिला। उसके बाद मेरा मन वहां से बेचैन होने लगा। वहां पर बस तीन ही जगह आंगन, किचन और बेडरूम में ज्यादातर शूट होता था। मैं तो मुंई फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर आया था और एक दिन वो भी छोड़कर अपने एक गीतकार मित्र के साथ उसके रूम में रहने लगा।


दिनभर अकेले ही रहने से और पढ़ने-लिखने से मुझे खुद के अंदर निष्पक्षता से झांकने का मौका मिला। और मुझे ये अहसास हुआ कि असली खुशी अपने मन का काम करने में है। मैं मुंबई से घर आ गया और टीचर की तैयारी की और पास भी हो गया। साथ ही अब पर्यावरण से संबंधित बहुत सारे कार्य करता हूं। अब जीवन में हमेशा एक नया उत्साह महसूस होता है। आखिर में सुशील ने लिखा- बस यही सोचते हैं कि जीवन की जरूरतें जितनी कम हो सके रखनी चाहिए, बस इतना ही कमाना है कि जो जरूरतें वो पूरी हो जाएं।


Popular posts from this blog

देवदास: लेखक रचित कल्पित पात्र या स्वयं लेखक

नई चुनौतियों के कारण बदल रहा है भारतीय सिनेमा

वैश्विक गायक मुकेश पर ‘सान्निध्य लंदन’ ने किया विशेष अन्तरराष्ट्रीय सभा का आयोजन