स्क्रीन पर आग और शब्दों में ज़हर, टीवी डिबेट बनी मौत का कहर

वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर राजदीप सरदेसाई जब अपने ट्वीट में टेलीविजन चैनलों पर होने वाली डिबेट को मुर्गों की लड़ाई कहते हैं, तो शायद ही किसी को हैरानी होती है। पिछले हफ्ते हम लोगों ने देखा कि किस तरह एक टीवी चैनल पर डिबेट में शामिल होने के थोड़ी देर बाद ही कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की मौत हो गई। उनकी मौत के बाद टीवी चैनलों पर होने वाली परिचर्चाओं की आक्रामकता पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।


इन्हीं हालात में कांग्रेस के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील जयवीर शेरगिल ने सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को एक पत्र भेजकर मीडिया संस्थानों के लिये एडवाइजरी जारी करने को कहा है, ताकि कोई ऐसी आचार संहिता लागू की जाए, जिससे ‘सनसनीखेज, निंदात्मक और जहरीले‘ टीवी डिबेट को नियंत्रित किया जा सके। उन्होंने कहा है कि आचार संहिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि कोई भी एंकर लक्ष्मण रेखा को ना लांघ सके। कांग्रेस के कई नेताओं ने शेरगिल के विचार का समर्थन किया। पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता आनंद शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के दिशानिर्देशों का उल्लंघन हो रहा है और सुधार की जरूरत है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट कर सवाल किया, ‘कब तक जहरीली डिबेट और विषैले प्रवक्ता संयम और सादगी की जुबान की जान लेते रहेंगे? कब तक विभाजन का जहर इस देश की आत्मा को लीलता रहेगा?‘



दरअसल टीवी कंटेंट को स्वतः नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जो व्यवस्था बनाई वो वर्ष 2011 में ही लागू हो पाई, जब इंडियन ब्राडकास्टिंग फेडरेशन ने ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कम्प्लेंट्स काउंसिल का गठन किया। इसे भारतीय प्रेस परिषद की तर्ज पर बनाया गया, जिसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश करते हैं और इसमें टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों को बतौर सदस्य नियुक्त किया गया। लेकिन आज इसका हश्र भी प्रेस काउंसिल जैसा ही होता नजर आ रहा है। भारतीय प्रेस परिषद एक स्वतः नियंत्रण करने वाली संस्था है, मगर उसके अधिकार सीमित हैं। इसी तरह टीवी के लिए जो व्यवस्था की गई है, वो भी भारतीय प्रेस परिषद की तरह ही अधिकारविहीन है।


ज्यादातर टीवी दर्शकों का भी यही मानना है कि कोई भी लक्ष्मण रेखा हमारे टीवी एंकरों की राह नहीं रोक सकती। चैनलों पर होने वाली डिबेट का स्तर दिनोंदिन गिर रहा है और राजीव त्यागी की असमय मौत के बावजूद ‘मुर्गों की लड़ाई‘ बदस्तूर जारी है। ऐसी सूरत में कोई भी आचार संहिता उन पर लगाम लगाने में कामयाब रहेगी, इसमें संदेह ही है।


इस मामले के मद्देनजर हमें मशहूर टीवी एंकर रवीश कुमार की यह बात बार-बार याद आती है कि ‘ये टीवी आपको बीमार, बहुत बीमार कर देगा!’ रवीश यहीं पर नहीं रुके, बल्कि उन्हांेने एक अवार्ड फंक्शन में यहां तक कहा कि ‘आप लोग टीवी मत देखिए, मुझे भी मत देखिए। अपने बच्चों को भी टीवी से दूर रखिए, क्यांेकि टीवी आपको हत्यारा बना रहा है।’ टीवी पर बैठकर टीवी को ही कोसने वाले रवीश कुमार की इस बात पर लोगों ने बहुत हैरानी जताई थी। लेकिन अब लगता है कि उन्होंने सही कहा था।


साफ नजर आता है कि हमारे देश में समाचार दिखाने वाले निजी टीवी चैनलों का बड़ा हिस्सा सूचना और संवाद के अलावा हर काम कर रहा है। कई लोगों को लगता है कि खबरों को परोसने और परिचर्चा आयोजित करने में अराजकता और सतहीकरण स्पष्ट दिखने लगा है। लेकिन दूसरी तरफ मीडिया घरानों का कहना है कि वो वही कंटेंट दिखाते हैं जिसे लोग पसंद करते हैं। इसमें टीआरपी रेटिंग्स की भी बड़ी भूमिका है जो कार्यक्रम की लोकप्रियता के बारे में बताती है और इन्ही रेटिंग्स पर संस्था की कमाई को निर्भर रहना पड़ता है। दर्शक भी साफ समझने लगे हैं कि टीवी की परिचर्चा को अब सियासी औजार में तब्दील कर दिया गया है। कॉर्पोरेट और राजनीतिक दलों के गठजोड़ ने इसे नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। दुर्भाग्य से अब इन परिचर्चाओं के जरिये खबरें प्लांट की जा रहीं हैं और लोगों की राय को भी प्रभावित करने का काम किया जा रहा है।


सबसे मुश्किल बात यह है कि टीवी चैनलों पर कंटेंट को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि जैसे ही इस दिशा में कोई कदम उठाया जाएगा, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार के रूप में देखा जाने लगेगा। टीआरपी की वजह से लगभग हर समाचार चैनल परिचर्चा पर ज्यादा ध्यान देने लग गया है। बड़े राजनीतिक दलों के नेता भी टीवी परिचर्चा को अपने सियासी हित साधने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर बड़े नेताओं को स्पष्ट हिदायत मिलती है कि जब कभी वे किसी चैनल पर परिचर्चा में शामिल होते हैं, तो उन्हें पूरी ताकत के साथ जोर से अपनी बात रखनी चाहिए और जरूरत पड़े तो अपने विरोधी पर निजी हमले भी करने चाहिए। टीवी परिचर्चा के प्रसारण के तुरंत बाद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और उनके आईटी सेल के विशेषज्ञ टीवी डिबेट के दृश्यों को संपादित करते हुए अपने मतलब के हिस्सों को सोशल मीडिया पर वायरल करने में जुट जाते हैं।


ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो टेलीविजन चर्चाओं के गिरते स्तर के लिए दर्शकों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि टीवी डिबेट ने गंभीर पत्रकारिता को बहुत नुकसान पहुंचाया है। टीवी में परिचर्चा सिर्फ नफरत की नुमाइश का अड्डा बनता जा रहा है, जिससे लोगों के दिमाग में जहर घुल रहा है। लेकिन अब वो वक्त आ गया है कि अगर टीवी माध्यम को अपनी विश्वसनीयता को कायम रखना है, तो उसे अपनी परिचर्चाओं के स्तर पर तत्काल ध्यान देना होगा और इन्हें जहरीले बयानों को परोसने का सबसे उपयुक्त मंच बनने से बचाना होगा। शायद राजीव त्यागी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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