सिने संगीत के सुरीले सफ़र की दिलचस्प दास्तान- ‘सात सुरों का मेला'

हिंदी सिनेमा से संबंधित कोई भी चर्चा गीत और संगीत के बिना पूरी नहीं हो सकती। सिनेमाई गीत-संगीत ने देश की पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा' से लेकर आज तक करीब-करीब नौ दशक का सफर पूरा कर लिया है और इस दौरान कभी ऐसा नहीं हुआ कि फिल्मी गानों का या फिल्म संगीत के जादू का असर थोड़ा-सा भी कम हुआ हो। फिल्मी गानों की धुनों पर गुनगुनाते हुए, नाचते हुए या गाते हुए पीढ़ियां जवान हुई हैं और हर दौर में लोगों ने इस परंपरा को अपने अंदाज में आगे बढ़ाया है। चाय के प्याले में  शक्कर की मिठास की तरह गीत-संगीत न सिर्फ हमारी फिल्मों में, बल्कि हमारी जिंदगी में  भी घुले हुए हैं।



लोग तो यहां तक कहते हैं कि गीत-संगीत की परम्परा किसी फिल्म की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह प्रतीत होती है। किसी हद तक यह बात ठीक भी है। बहुत सारी फिल्में ऐसी हैं, जिनकी अपार लोकप्रियता के पीछे उस फिल्म के गानों और उनकी धुनों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। कई फिल्में ऐसी भी हैं, जो दूसरे तमाम कारणों के साथ-साथ अपने गीतों की वजह से भी पहचानी जाती हैं। पचास के दशक की फिल्म ‘महल' को लोग आज भी इसलिए याद करते हैं कि इसमें ही लता मंगेशकर ने ‘आएगा आने वाला' गाया था, जो बाद में बहुत मशहूर हुआ था। या फिर ‘मुगल-ए-आजम' से ‘प्यार किया तो डरना क्या' निकाल दीजिए, फिल्म की चमक फीकी पड़ जाएगी। ‘मेरा जूता है जापानी' सुनकर राज कपूर और ‘आवारा' की यादें ताजा हो आती हैं, तो ‘मेरे देश की धरती सोना उगले' सुनते ही ‘उपकार' का भारत कुमार जेहन में घूम जाता है। फिल्म ‘सूरज' का गीत ‘बहारों फूल बरसाओ' पिछले करीब साठ साल से बारातों में अनिवार्य रूप से बजता रहा है, तो ‘नीलकमल' में मुहम्मद रफी का गाया ‘बाबुल की दुआएं लेती जा' दुल्हन की विदाई के वक्त बजने वाले नेशनल एंथम का रूप ले चुका है। और हाल के दौर की बात करें, तो ‘बीड़ी जलाई ले' से लेकर ‘मसक्कली मसक्कली' तक और ‘कजरारे कजरारे' से लेकर ‘ओ राधा तेरी चुनरी' तक- अनगिनत फिल्मी गाने ऐसे हैं, जिन्हें लोगों ने अपने दिल के करीब महसूस किया है।


हिंदी सिनेमा के गीत-संगीत के इस करिश्माई जादू को ही राजीव श्रीवास्तव ने अपनी किताब ‘सात सुरों का मेला‘ में समेटने की ईमानदार कोशिश की है। सिने विश्लेषक के तौर पर अपनी एक अलहदा पहचान बनाने वाले राजीव श्रीवास्तव ने सिने गायकों और संगीतकारों के जीवन पर भरपूर लेखन किया है। अपनी इस किताब में उन्होंने सिनेमाई गीत-संगीत के 1931 से लेकर 2020 तक के नौ दशकों के सफर को शामिल किया है। उनकी लेखन शैली इतनी सरल और सहज है कि ऐसा लगता है नौ दशकों के इस सफर में  वे भी एक जागरूक मुसाफिर की तरह शामिल रहे हैं। इस पूरे सफर को उन्होंने दस-दस साल के कालखंड में  बांटा है और हर दशक के प्रमुख गीतों, गीतकारों, गायकों और संगीतकारों पर विस्तार से लिखा है।


'आलमआरा' के साथ शुरू हुए बोलती फिल्मों के दौर की चर्चा इस किताब का पहला पड़ाव है। यही वो फिल्म है जिसने वजीर मुहम्मद खान के रूप में भारतीय सिनेमा को पहला गायक दिया। उनका गाया ‘दे दे खुदा के नाम पे प्यारे ताकत हो गर देने की'- वो गीत है जिसे हिंदी फिल्मों के पहले गीत का दर्जा हासिल है। बाद के वर्षों में हिंदी सिनेमा में प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत हुई। सवाक फिल्मों में कैसे और कब पार्श्व  गायन की एंट्री हुई, कैसे गीतकार-संगीतकार और गायक-गायिकाओं का अपना प्रशंसक वर्ग तैयार होने लगा और कैसे फिल्मी गीतों का जादू लोगों  को लुभाने लगा- इन तमाम बातों की जानकारी इस किताब में मिलती है। जैसा कि किताब के आमुख में ‘माधुरी' के यशस्वी पूर्व संपादक अरविंद कुमार लिखते हैं, ‘.......फिल्म संगीत से संबंधित ढेरो किस्से-कहानियां जो तब मौखिक रूप से कहे और सुने गए, उन्हें  समेट कर एक पुस्तक का रूप दिया गया है। साल-दर-साल के कई महत्वपूर्ण और लोकप्रिय गीतों का उल्लेख करते हुए उन्हें इस पुस्तक में शब्द रूप में  दिया गया है, जिसे संदर्भ के तौर पर मैं एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र मानता हूं। गीतों का साहित्यिक और लोक पक्ष एक तरफ है, तो दूसरी ओर सिने संगीत में लोक और बाद में आए पश्चिमी प्रभाव को भी समेटा गया है।'


जाहिर है कि सिनेमाई गीतों की शैली, उनकी लोकप्रियता और उनकी विकास यात्रा को लेकर राजीव श्रीवास्तव ने भरपूर मेहनत की है। यूं तो नब्बे साल के इतिहास को एक किताब में समेटना बेहद मुश्किल काम नजर आता है, लेकिन अगर पूरी लगन और ईमानदारी के साथ काम किया जाए और परिश्रम और शोध में कोई कमी नहीं हो, तो यह काम नामुमकिन भी नहीं है। सरगम के प्रवाह पर सवार होकर इस किताब को पढ़ना शुरू कीजिए, हो सकता है अंतिम अध्याय पढ़ने तक आप सरगम के सात सुरों से बाहर ही नहीं निकलना चाहें।


सात सुरों का मेला


लेखक - राजीव श्रीवास्तव


प्रकाशक - प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली


पृष्ठ - 310/ मूल्य - 515 रुपए


लेखक से संपर्क -


( Mobile & WhatsApp: +91-9415323515, E-mail: rajeevrsvpshrivastav@gmail.com)


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