ऑनलाइन कक्षाओं में हिस्सा लेने वाले 84 फीसदी छात्र स्मार्टफोन पर निर्भर, बच्चों की दिमागी हालत का मुद्दा दरकिनार


नई दिल्ली। ज्यादा दिन नहीं हुए, जब अभिभावकों के पास बच्चों के स्कूलों से इस तरह के मैसेज आते थे कि अपने बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखें और स्कूल में अगर किसी विद्यार्थी के पास मोबाइल मिला, तो उसे जब्त कर लिया जाएगा। इसके साथ ही मोबाइल फोन से होने वाले नुकसान से भी अभिभावकों को आगाह किया जाता था और यहां तक कहा जाता था कि सेलफोन का रेडिएशन बच्चों की दिमागी सेहत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन अब तमाम स्कूल ऑनलाइन  टीचिंग में जुटे हैं और वे अपने विद्यार्थियों को स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं।
पिछले हफ्ते राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने केंद्रीय विद्यालय से जुड़े छात्रों के साथ एक सर्वे किया, जिसमें सामने आया कि  ऑनलाइन कक्षाओं में हिस्सा लेने वाले 84 प्रतिशत छात्र स्मार्टफोन का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। एनसीईआरटी द्वारा 18 हज़ार से अधिक स्कूलों पर किए गए सर्वे में कुल 35,000 छात्रों, शिक्षकों, प्रिंसिपलों और अभिभावकों को शामिल किया गया था। इसमें से लगभग 28 प्रतिशत ने बिजली बीच में कटने या इसकी कमी को एक बड़ी बाधा बताया, वहीं 33 फीसदी बच्चों ने कहा कि ऑनलाइन लर्निंग कठिन है। 



इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, छात्रों को लेकर किए गए एक सरकारी सर्वे में सीबीएसई संबद्ध स्कूलों, केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में पढ़ने वाले 18,188 स्कूलों के बच्चों को शामिल किया गया। शिक्षा मंत्रालय द्वारा साझा किए गए नतीजों के मुताबिक, करीब 33 फीसदी बच्चों ने ऑनलाइन लर्निंग को कठिन या बोझिल महसूस किया। सबसे खास बात यह है कि सर्वे में पाया गया कि ऑनलाइन कक्षाओं में हिस्सा लेने वाले 84 फीसदी छात्र स्मार्टफोन पर निर्भर हैं जबकि मात्र 17 फीसदी छात्र ही लैपटॉप का इस्तेमाल कर पा रहे हैं। वहीं, टेलीविजन और रेडियो का इस्तेमाल नाममात्र का हो रहा है।


सर्वेक्षण के अनुसार, कुल 35,000 छात्रों, शिक्षकों, प्रिंसिपलों और अभिभावकों में से लगभग 28 प्रतिशत ने एक बड़ी बाधा के रूप में बीच-बीच में बिजली कटने या उसकी कमी का हवाला दिया।


सर्वे में उन विषयों के बारे में भी जानकारी इकट्ठा की गई, जिनमें बच्चों को घर पर सबसे अधिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। सर्वे में कहा गया, गणित में कई अवधारणाएं होती हैं जिनमें सहभागिता, शिक्षक से सतत तालमेल, निगरानी की आवश्यकता होती है और इन पहलुओं की शिक्षण के ऑनलाइन मोड में कमी थी। इसमें कहा गया, गणित के अलावा विज्ञान को लेकर भी चिंताएं जताई गईं क्योंकि इसमें कई अवधारणाएं और व्यावहारिक प्रयोग शामिल होते हैं, जिन्हें केवल प्रयोगशाला में ही किया जा सकता है। एनसीईआरटी द्वारा यह सर्वेक्षण लॉकडाउन के दौरान और बाद में छात्रों के बीच अंतराल और सीखने के नुकसान से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने के लिए किया गया था। वहीं, डिजिटल उपकरणों को हासिल कर पाने में असक्षम या सीमित पहुंच हासिल करने वाले छात्रों की मदद के लिए दिशानिर्देशों में अधिक से अधिक शिक्षकों का इंतजाम करने का सुझाव दिया गया है। चूंकि बिना किसी डिजिटल उपकरण वाले बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकें एकमात्र संसाधन होंगी, इसलिए दिशानिर्देश में कहा गया है कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करें कि उनके पास पूरा पाठ्यपुस्तकों सेट घर पर उपलब्ध हो। वे यह भी सुझाव देते हैं कि पूरक शिक्षण सामग्री, जैसे वर्कबुक, वर्कशीट, प्रोजेक्ट, क्विज़ और पहेलियां छात्रों को घर पर भेजी जाएं।


दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया है, ‘अगर स्कूल के शिक्षक और प्रमुख उसी इलाके में रहते हैं, जहां बहुत से साधनविहीन बच्चे भी रहते हैं, तो ऐसे में स्कूल सामुदायिक मदद के साथ एक शिक्षा टीम का गठन कर सकते हैं। इसमें अन्य स्कूलों के शिक्षकों को भी शामिल किया जा सकता है और वालंटियर्स की मदद से किसी खुली जगह में सुरक्षित क्लासेज लगाई जा सकती हैं।’


मंत्रालय के अनुसार अगर ऐसा भी संभव न हो सके तब उस स्थिति में शिक्षक उन बच्चों के ग्रुप बना सकते हैं, जो एक ही इलाके में रहते हैं और समान या आगे-पीछे की कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। वे समूह में एकदूसरे की मदद से पढ़ाई कर सकते हैं। मंत्रालय का एक सुझाव यह भी है कि ग्रामीण स्तर पर बच्चे शैक्षणिक कार्यक्रम देख सकें, इसके लिए सामुदायिक केंद्र को टीवी सेट दिया जा सकता है।


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