कुछ भी बोल कि लब आजाद हैं तेरे!

बोल कि लब आजाद हैं तेरे


बोल जबाँ अब तक तेरी है


तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा


बोल कि जाँ अब तक तेरी है!


मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने जब यह शेर लिखा था, तब उन्होंने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि इक्कीसवीं सदी में ऐसा माहौल भी रचा जाएगा, जब लोेग कुछ भी बोलते नजर आएंगे। आज सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर कमोबेश ऐसा ही माहौल है, जहां लोग अपने मन की भड़ास को ज्यों का त्यों दूसरों के सामने परोस रहे हैं। उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं है कि उनके बोलने से हवाओं में किस कदर जहर घुल रहा है, किस हद तक नफरत फैल रही है और कैसे लोग एक दूसरे को मारने पर उतारू हो रहे हैं।



क्या हम अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल दूसरे तमाम लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए कर सकते हैं? चूंकि हमें देश के संविधान ने बोलने और अपने विचार अभिव्यक्त करने की आजादी दी है, तो क्या हम इस आजादी का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं? मौजूदा दौर में हम सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर जो कुछ बोलते हैं या पोस्ट करते हैं, क्या वहां भी हमें अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार पूरी तरह हासिल है? क्या सोशल मीडिया पर हमारे विचारों पर रोक लगाने से हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आहत होती है? वर्तमान दौर में ये तमाम सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब पूरी ईमानदारी के साथ भले ही हम नहीं तलाशें, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते सुनाए अपने एक फैसले में इनके जवाब दे दिए हैं।


बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि दो धार्मिक समुदायों के बीच नफरत का बीज बोने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। खास तौर पर फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय इसका जरूर ख्याल रखा जाना चाहिए। भड़काऊ पोस्ट और मैसेज सार्वजनिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह अहम टिप्पणी की।


मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश माधव जामदार की पीठ ने कहा कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे अन्य धर्मों के सदस्यों के साथ शांति से रह सकते हैं। लोग बोलने की आजादी व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल अनुशासित होकर करें और खुद पर तर्कसंगत पाबंदी लगाए। खास तौर से सोशल मीडिया में पोस्ट करते समय इसका ध्यान जरूर रखें, क्योंकि मौजूदा समय हमारी परीक्षा की घड़ी है। पीठ ने कहा, आलोचना निष्पक्ष व रचनात्मक होनी चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में दूसरों की आस्था को आहत नहीं करना चाहिए।


पीठ ने इसके साथ ही सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की सख्ती का समर्थन करते हुए यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19 (2) सरकार को यह अधिकार देता है कि वह कानून के मुताबिक तर्कसंगत वजहों के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा सकती है। सरकार सोशल मीडिया पर पूरी तरह से बिना सोचे-समझे और भड़काऊ पोस्ट पर लगाम लगाने के लिए अनुच्छेद 19 (2) द्वारा दी गई शक्ति का प्रयोग कर सकती है।


जाहिर है कि हमें अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल संविधान के तहत तर्कसंगत तरीके से करना चाहिए। हमारे संविधान निर्माताआंे की भी संभवतः यही मंशा रही होगी, इसीलिए उन्होंने कानून के मुताबिक तर्कसंगत वजहों के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रावधान किया। लेकिन उस दौर में चूंकि सोशल मीडिया की कोई आहट नहीं थी, लिहाजा इस नए और आॅनलाइन माध्यम की आजादी पर संविधान में कोई चर्चा नहीं है। आज हालत यह है कि बेलगाम घोड़े की तरह लोग सोशल मीडिया पर तमाम तरह की बातें लिख रहे हैं और घोर आपत्तिजनक वीडियो पोस्ट कर रहे हैं और इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगांे की है, जो सोशल मीडिया पोस्ट के बहाने दूसरे समुदायों के लोगों  को निशाना बना रहे हैं।


देश में कोरोना वायरस के शुरुआती हमले के दिनों को याद कीजिए। उन दिनों दिल्ली में निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के नुमाइंदों की एक काॅन्फ्रेंस को लेकर देशभर में यह माहौल बना दिया गया था, मानो हमारे देश में कोरोना इन लोगों की वजह से ही फैला हो। इस मामले में सोशल मीडिया पर तबलीगी जमात के लोगांे को लेकर नफरत भरे संदेश पोस्ट किए गए और तमाम लोगों ने इन संदेशों की सच्चाई को परखे बिना उन्हें आगे फाॅरवर्ड किया।


पिछले ही हफ्ते बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने तबलीगी जमातियों के खिलाफ दाखिल एफआईआर को खारिज किया और कहा कि बिना सोचे-समझे इन लोगों को बलि का बकरा बना दिया गया। अफसोस की बात यह है कि जिन दिनों देशभर में तबलीगी जमात के खिलाफ लोगांे का गुस्सा चरम पर था, उन दिनों हमारे यहां का मीडिया भी आम लोगों की जुबान बोल रहा था और तबलीगी जमात के लोगों को जमकर गालियां दे रहा था। लेकिन अब जबकि हाई कोर्ट की बेंच ने इस मामले में तल्ख टिप्पणियां की, तो मीडिया में  यह पूरी खबर ही गायब हो गई। अदालत ने इस मामले को लेकर मीडिया के रवैये पर भी सख्त एतराज जाहिर किया और कहा कि गलत नीयत से तबलीगी जमात के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया।


आज हालात यह हैं कि दुष्प्रचार के लिए मौजूदा दौर में सोशल मीडिया को सबसे प्रभावी हथियार माना जाता है। घटना की सच्चाई जाने बिना लोग सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर तमाम तरह के संदेश फैलाते रहते हैं। कच्ची उम्र के नौजवान इन संदेशों को ही जीवन का असली सच मान बैठते हैं और मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। हाल के दौर में अनेक ऐसी घटनाओं के हम गवाह बने हैं, जब सोशल मीडिया पर फैली किसी अफवाह के कारण दंगे जैसे हालात हुए हैं। ऐसी सूरत में हमें अभिव्यक्ति की आजादी और सोशल मीडिया के लोकतंत्रीकरण पर नए सिरे से विचार जरूर करना चाहिए।


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