कुमकुम - एक चमकता सितारा


चुलबुली, जिंदादिल और जिंदगी से भरपूर कुमकुम ने अपनी जिंदगी को भी उसी खूबसूरती से जिया, जितनी खूबसूरत वह स्वयं थी। उन्होंने कई फिल्मों में काम किया जिनमे मदर इंडिया, कोहिनूर, उजाला, नया दौर, सपेरा, लुटेरा, राजा और रंक, गीत, ललकार जैसी फ़िल्में ख़ास हैं। 


मुंबई। साठ और सत्तर के दशक में सिनेमा के रूपहले परदे पर छाई रहीं कुमकुम की ज्यादातर फिल्में भले ही ब्लैक ,ंड व्हाइट रही हों, लेकिन उनका फिल्मी कॅरियर बहुत चमकदार रहा। आज जबकि कुमकुम हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी मासूम और निश्छल मुस्कराहट सिने प्रेमियों को हमेशा लुभाती रहेगी। शायद इसीलिए कहते हैं कि कलाकार मरकर भी नहीं मरते। वे अपने अभिनय, अपनी फिल्मों से अपने दर्शकों के दिल में बसी यादों में अमर हो जाते हैं।



अपने फिल्मी करियर में टॉप मोस्ट फिल्मकारों के साथ काम कर चुकीं कुमकुम कभी स्वयं टॉप मोस्ट हीरोइन का दर्जा न पा सकीं, लेकिन उनके चाहनेवालों की संख्या अनगिनत थी, जो आज भी मौजूद है। हालांकि टॉप मोस्ट नायिका ना बन पाने का मलाल उनके मन में कभी ना रहा और यही बात उन्हें बाकी अन्य हीरोइनों से अलहदा करती हैं। चुलबुली, जिंदादिल और जिंदगी से भरपूर कुमकुम ने अपनी जिंदगी को भी उसी खूबसूरती से जिया, जितनी खूबसूरत वह स्वयं थी। 
बकौल तबस्सुम, 1938 में हुसैनाबाद, बिहार में जन्मीं कुमकुम का असली नाम जैबुनिसा था। उनके पिता सैय्यद नवाब मंसूर हसन ना सिर्फ पटनी के नवाब थे, बल्कि बेहद अमीर और रईस इंसान भी थे लेकिन सरकार ने उनके पिता की सारी सम्पत्ति अपने कब्जे में ले ली और मजबूरन पूरे परिवार को हुसैनाबाद से कलकत्ता आना पड़ा। कलकत्ता की हवा उन्हें कतई रास नहीं आई और उन्होंने कुमकुम और उनकी माँ को छोडकर दूसरी शादी कर ली। अपनी दूसरी बीवी के साथ वह पाकिस्तान चले गए, और दुबारा पलटकर कभी वापस नहीं आए। उनकी माता खुर्शीद बानो एक हाऊस वाइफ थीं। यही वजह है कि पति की बेवफाई और बेटी जैबुनिसा को अकेले पालने में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। 
कुमकुम को फिल्मों में सबसे पहला मौका मशहूर निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता सोहराब मोदी ने 1954 में ‘मिर्जा गालिब‘ फिल्म में दिया। हालांकि इस फिल्म में कुमकुम का रोल बहुत छोटा था। इस फिल्म ने कुमकुम को बड़े परदे पर आने का मौका जरूर दिया लेकिन उन्हें असली प्रसिद्धि मिली गुरुदत्त की फिल्म ‘आर-पार‘ के गीत ‘कभी आर कभी पार.....‘ से। गौरतलब है कि यह गीत पहले जगदीप पर फिल्माया जाने वाला था लेकिन परफेक्शनिस्ट गुरुदत्त साहब ने सोचा कि इस गीत में किसी नायिका का होना बेहद जरूरी है और कुमकुम का चयन कर लिया गया। इस गीत के बाद कुमकुम, गुरुदत्त की ही फिल्म ‘प्यासा‘ में भी एक छोटे से किरदार में नजर आईं। इन छोटे-छोटे किरदारों ने ही कुमकुम को ना सिर्फ फिल्म ‘कोहिनूर‘ के गीत ‘मधुबन में राधिका नाचे रे‘ में अपना नृत्य कौशल को दिखाने का मौका दिया, बल्कि उन्हें लीजेंड कलाकार दिलीप कुमार के साथ फ्रेम शेयर करने का सुनहरा मौका भी दिया। 
फिल्म ‘कोहिनूर‘ में कुमकुम के काम से प्रभावित होकर ही रामानंद सागर ने उन्हें अपनी फिल्म ‘ललकार‘ में धर्मेन्द्र के ऑपोजिट बतौर हीरोइन साइन की। इसके अलावा वह रामानन्द सागर की फिल्म ‘आँखें‘, ‘गीत‘ और ‘जलते बदन‘ में भी नजर आईं। 1973 में आई फिल्म ‘जलते बदन‘ में उनके हीरो किरण कुमार थे और यह फिल्म उनके फिल्मी करियर की आखिरी फिल्म रही। 
यह तो सभी जानते हैं कि कुमकुम ना सिर्फ बेहतरीन अदाकारा थीं बल्कि एक बेहतरीन नृत्यांगना भी थीं। वो हर नृत्य को पूरी परफेक्शन के साथ करती थीं, फिर वह चाहे भारतीय शास्त्रीय नृत्य हो या फिर पाश्चात्य। कुमकुम ने अपने नृत्य कौशल का बखान करते हुए अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मैं पंडित शंभू महाराज जी की बहुत शुक्रगुजार हूँ, जिन्होंने मुझे अपनी बेटी की तरह नृत्य की तालीम दी। आज उन्हीं की बदौलत मैं ना सिर्फ कत्थक बल्कि हर तरह के नृत्य को पूरी नजाकत के साथ कर लेती हूँ।‘
लखनऊ के रहनेवाले बिजनेसमैन सज्जाद अकबर खान से 1975 में शादी कर कुमकुम ने अपना घर बसा लिया और फिल्मों से संन्यास लेकर अपने पति संग सऊदी अरब चली गईं। 
बकौल तबस्सुम, अपनी शादी को लेकर एक बार कुमकुम ने कहा था, ‘बहुत बदकिस्मत होते हैं वो लोग, बल्कि बहुत बदकिस्मत नहीं, बहुत बेवकूफ होते हैं वो लोग जो बहुत पैसा कमाने के चक्कर में अपना सारा वक्त खर्च कर देते हैं। और होता यूं है कि उस पैसे को एंजॉय करने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं बचता।‘ अपनी शादीशुदा जिंदगी से बेतहाशा खुश कुमकुम 20 साल बाद 1995 में वापस मुंबई आ गई और अपने शौहर और इकलौती बेटी अंदलीब अकबर खान के साथ मुंबई में बस गईं। 28 जुलाई को यहीं उन्होंने अपनी आखिरी साँसें लीं।     
हिंदी फिल्मों के अलावा कुमकुम ने दो भोजपुरी फिल्मों में भी अभिनय किया था। इनमें उनकी पहली फिल्म, भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो‘ और ‘लागी छूटे नाही राम‘ शामिल है। यह बात काफी दिलचस्प है कि भारत की पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो‘ को बनाने की पेशकश देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने की थी और यही एकमात्र फिल्म है जिसे उन्होंने बड़े चाव से देखा भी था। 


Popular posts from this blog

जुनूनी एंकर पत्रकार रोहित सरदाना की कोरोना से मौत

'बालिका वधु' जैसे धारावाहिकों के डायरेक्टर रामवृक्ष आज सब्जी बेचने को मजबूर

'कम्युनिकेशन टुडे' ने पूरा किया 25 साल का सफ़र, मीडिया शिक्षा की 100 वर्षों की यात्रा पर विशेषांक