देवदास: लेखक रचित कल्पित पात्र या स्वयं लेखक

मुंबई। प्रेम से अघाए लोगों के उदाहरणार्थ भले कोई व्यक्ति विशेष की रचना ना हुई हो लेकिन प्रेम में बौराए-पगलाए लोगों को देखकर न चाहते हुए भी एक नाम जेहन में घूम जाता है और वो नाम है 'देवदास' का। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय नामक बांग्ला लेखक द्वारा रचित 'देवदास' की कहानी प्रेम में हारे हुए एक ऐसे ही पुरूष की कहानी है जो पहले अपनी प्रेयसी पारो अर्थात पार्वती के प्रेम को ठुकराकर चला जाता है लेकिन बाद में जब प्रेम की अकुलाहट से तड़पकर वह वापस लौटता है तो न सिर्फ अपने प्रेम को खो देता है, बल्कि पारो को भी खो देता है और गली-गली भटकने लगता है।



प्रेम को ठोकर मारकर ठुकराए गए देवदास की कहानी ने ना सिर्फ बांग्ला के साथ हिंदी साहित्य में भी अपनी एक जगह बनाई बल्कि पूरी भारतीय फिल्म उद्योग में भी अपने आकर्षण का लोहा मनवाया। यही वजह है कि शरतचंद्र चट्टोपाध्याय रचित उपन्यास 'देवदास' पर बंगाली और हिंदी के अलावा असमी, ऊर्दू, तमिल, तेलुगु, और मलयालम में भी फ़िल्में बन चुकी हैं। गौरतलब है कि हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान के फिल्मकार ख्वाजा सरफ़राज़ ने भी 1965 में इस फिल्म को बनाकर अपने लोगों के सामने परोसा और काफी वाहवाही बटोरी। इसके अलावा वर्ष 2015 में भी पाकिस्तान में एक बार फिर इस फिल्म का निर्माण किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि कुछ फिल्मकारों ने फिल्मों के अलावा वेब सिरीज़ का भी निर्माण किया है जो आधुनिक समय में देवदास की प्रासंगिकता से प्रेरित हैं। इनमें मुख्यत: अनुराग कश्यप की फिल्म 'देव डी' (2009), रिक बासु की बंगाली फिल्म 'देवी' (2017), सुधीर मिश्रा की 'दास देव' (2018), और केन घोष की वेब सिरीज़ 'देव डी डी' (2017) शामिल है। 


इसमें दो राय नहीं कि देवदास के व्यक्तित्व से साहित्य के साथ पूरा फिल्म उद्योग ही नहीं बल्कि जनमानस भी प्रभावित था लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय रचित 'देवदास' का नायक देवदास था कौन ? क्या यह लेखक के मित्र मंडली में से कोई एक था या उनकी कल्पना से उपजा मात्र एक पात्र ? हालांकि इस सन्दर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफ़ेसर जे.एन. सिन्हा ने लिखा है- सन 1893 से शरतचंद्र बिहार के भागलपुर में मामा के साथ रहते थे। माना जाता है कि युवा लेखक शरत ने अपने जीवन के आधार पर ही उपन्यास के मुख्य पात्रों की कथा लिखी होगी। देवदास उपन्यास लिखा तो गया था सन 1901 में लेकिन छपा 1917 में। और तत्काल लोकप्रियता के शिखर तक जा पहुंचा। देवदास और पारो में कुछ ऐसा था जो सबके दिल को छूता था। पाठक और फ़िल्म दर्शक अभी तक इस के जादू से अछूते नहीं रह पाते।


शरतचंद्र के एक सहपाठी की बहन धीरु असली पार्वती थी। स्वभाव से चंचल धीरु बात बात में रूठ जाती। दोनों लड़ते, रूठते जल्दी ही फिर मिल जाते थे। अकसर नदी किनारे ख़ंजरबेग का मज़ार पर जा बैठते, भविष्य के जीवन के सपने देखते। धीरु के घरवालों ने दोनों की शादी की बात उठाई भी। शरत के परिवार ने ठुकरा दी। दोनों का दिल टूट गया। यह धीरु के लिए अपमानजनक भी था। पर वह शरत को नहीं भूल पाई। दोनों का मिलना जुलना चलता रहा। धीरु के घरवालों ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया। एक रात वह शरत से मिलने आई भी। लेकिन शरत ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। निराश धीरु शादी के बाद किसी और शहर में चली गई।


पूरी तरह टूटा शरत लगभग पागल हो गया। सन 1901 में एक बार फिर भागलपुर आया। इधर-उधर भटकते उसे धीरु मिली तो नशे में धुत शरत ने कौली में भर लिया। उसके आलिंगन से छूट कर किसी तरह धीरु ने पति से शिकायत कर दी। पति ने शरत की अच्छी ख़ासी मरम्मत करवा दी। हमलावर उसे मरा जान कर तालाब के किनारे डाल गए। सुबह पुंटी नाम की वेश्या ने उसे पहचाना और अपने साथ वेश्याओं की बस्ती चतुर्भुजस्थान ले गई।


अच्छा क़िस्सागो और गायक निराश शरत महफ़िलों की जान बन गया। उसे मिले मुज़फ़्फ़रपुर के रईस महादेव साहू–नाच रंग की महफ़िलों के शौक़ीन। उन्होंने ही शरत को उस मानसिक दुर्दशा से उबारा।


पिता की मृत्य पर शरत एक बार फिर टूट गया। भागलपुर आया। टूटे शरत को दोस्त महादेव साहू ने संभाला और मंसूरगंज की वेश्या कालिदासी से मिलवाया। शरत अब उसका दीवाना हो गया। यहीं शरत ने देवदास लिखना शुरू किया। कालिदासी बन गई चंद्रमुखी। धीरु का ही प्रतिरूप। कहते हैं कि शरत के लिए कालिदासी धंधा छोड़कर सड़कों पर भजन गाती फिरने लगी। धीरु की याद में शरत फिर भटकने लगा। 1903 में रंगून में नौकरी मिली। वहाँ की गंदी बस्तियों में एकाकी मस्त रहता था। शादी कर ली। पहले बेटा और बाद में पत्नी शांति देवी प्लेग का शिकार हो गए। एक बार फिर वही आवारगी – अनेक औरतों से संबंध। अंत में उसे मिली निर्धन हिरण्यमयी। दोनों साथ रहने लगे। वह 1960 में मरी।


1916 में रंगून से लौटने पर अकस्मात धीरु उसे फिर मिली। अब वह विधवा थी और शरत साहित्य का सिरमौर। दोनों के बीच क्या बात हुई – कोई नहीं जानता। धीरु का क्या हुआ – यह भी अज्ञात है।


गौरतलब है कि कुछ लोग जहाँ धीरू को पारो कहते हैं वहीँ बंगाली टोला के लोगों का कहना है कि शरत की दूसरी बचपन की साथी राजबाला, असली पारो है। भागलपुर से लम्बे समय तक दूर रहे शरत की अनुपस्थिति में राजबाला का विवाह मुजफ्फरपुर के एक शख्स से हो जाती है। जब शरत वापस भागलपुर लौटते हैं तो राजबाला के विवाह की खबर सुन राजबाला से मिलने मुजफ्फरपुर जा पहुँचते हैं। यह देखने कि शादी के बाद राजबाला की ख़ूबसूरती में कितना बदलाव आया है। 


एक और इसी तरह की मान्यता है कि पारो ना तो धीरू थी और न राजबाला. असली पारो थी नफ़र भट्ट की बेटी निरुपमा, जिससे रसिया शरत हर रोज़ फतेह जंग के मकबरे खंजरपुर में मिलने जाते थे और अनुपमा को बाँसुरी बजाकर सुनाया करते थे।


पारो और चंद्रमुखी के अलावा देवदास के डॉ प्रमुख किरदार और हैं जिनमें एक नाम है देवदास के दोस्त चुन्नीलाल का तो दूसरा नाम है नौकर धर्मदास का। तो शरत अर्थात देवदास को कालिदासी यानी कि चंदमुखी तक पहुँचानेवाले महादेव साहू हमें चुन्नी लाल के रूप में मिलते हैं और मामा के घर का मुशाई नाम का नौकर है धर्मदास।


किरदारों के अलावा भागलपुर के लोगों के अनुसार कई स्थान हैं जिनका 'देवदास' में बहुत बड़ी भूमिका है. इन स्थानों में मंसुरगंज, खंजरपुर, माणिक सरकार रोड, मसक चौक, बुर्हानाथ घाट, खिरनी घाट, फतेह जंग मकबरा तथा बंगाली टोला शामिल हैं।  


उपन्यास 'देवदास' के प्रकाश में आने के बाद वर्ष 1928 में नरेश मित्रा ने पहली बार फिल्म 'देवदास' का निर्माण किया, जो एक मूक फिल्म थी। तब से लेकर अब तक लगभग 18 बार इस फिल्म का निर्माण हो चुका है, जिसमें 1935 में प्रोमोथेश बरुआ द्वारा निर्मित 'देवदास' के साथ 1955  में बनी बिमल रॉय की 'देवदास' तथा में बनी संजय लीला भंसाली की 'देवदास' भी शामिल है।


दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2015 में बांग्लादेश फिल्म आर्काइव की तरफ से पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म आर्काइव को 'देवदास' की पहली बोलती फिल्म की एक दुर्लभ प्रति मिली, जो एकमात्र बांग्लादेश में उपलब्ध थी।


 


 


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