भारतीय सिनेमा की अनमोल विरासत है 'दो बीघा ज़मीन'

इटैलियन निर्देशक विट्टोरियो डी सीका की दी बाईसाइकिल थीफ  (1948)  के बेचारे बाप-बेटे की तरह 'दो बीघा ज़मीन ' के शंभू-कन्हैया भी शहर की डामर वाली निर्दयी सड़कों पर ठोकरे खाते हैं। ये दुनिया गांव जैसी नहीं कि हर कोई हर किसी को रोटी-पानी के लिए पूछता हो।  ये शहर है। आप मान नहीं सकते कि इस फिल्म को बनाने वाला एक जमींदार का बेटा था।  ये फिल्म न सिर्फ किसानी को समर्पित जबरदस्त फिल्म है बल्कि अभिनेताओं के लिए भी धर्मपुस्तक है। 


वित्तोरियो डिसिका की दी बाईसाइकिल थीफ से प्रेरित होकर बनी बिमल रॉय की फिल्म 'दो बीघा ज़मीन', आज़ादी के बाद के सिनेमा के इतिहास में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कंटेंट्स, प्रस्तुतिकरण, अभिनय और गीत-संगीत के कारण चर्चा का विषय बनने वाली पहली फिल्म थी। तब के दौर में देश का चिंतन समाजवादी था। किसान को ज़मींदार से और शहर को पूंजीपति, बनिया और साहुकार से मुक्ति दिलानी थी। अत: बिमल दा चाहते थे कि फिल्म का शीर्षक कुछ ऐसा हो कि पूरी फिल्म का ख़ाका एकबारगी ज़हन में समा जाए। इसके लिए उनकी नज़र गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कविता के शीर्षक 'दुई बीघा ज़मीन' पर पड़ी। फिल्म को मानवीय स्तर पर यथार्थवादी बनाने के लिए बिमल दा ने इस फिल्म की कहानी और संगीत कि ज़िम्मेदारी अपने मित्र सलिल चौधरी को दी और संवाद की ज़िम्मेदारी डाली मशहूर निर्माता, निर्देशक तथा पटकथा लेखक हृषिकेश मुखर्जी के कंधों पर। हालांकि उस वक्त हृषिकेश दा सिर्फ पटकथा लेखन में पारंगत थे।  


 


कहते हैं नव-यथार्थवाद के नाम पर बनी इस फिल्म को रिलीज़ के बाद पूंजीवादी व्यवस्था के नाम पर काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। समाजवाद उस वक्त शैशवावस्था में था। लेकिन जब फिल्म को कांस और कार्लोव वरी में आयोजित इंटरनेशनल मेलों में अवॉर्ड मिले तो देश में सबकी आंखें खुल गई। फिल्म के माध्यम से शोषित समाज और शोषणकर्ता का असल चित्र सामने आया। उसी साल देश में पहली बार नेशनल अवॉर्ड घोषित हुए थे और 'दो बीघा ज़मीन' को श्रेष्ठ फिल्म का अवॉर्ड मिला था। गौरतलब है कि इसी समय फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड भी स्थापित हुए थे और मजेदार बात यह है कि इतनी आलोचनाओं के बावजूद बेस्ट फिल्म के लिए 'दो बीघा ज़मीन' और बेस्ट डायरेक्टर के लिए बिमल रॉय के सिवाय कोई अन्य विकल्प ज्यूरी को नहीं मिला सो अवार्ड 'दो बीघा ज़मीन' को ही दिया गया। और तो और कई साल बाद 2005 में इंडिया टाइम्स मूवीज़ ने जब पच्चीस सर्वकालीन श्रेष्ठ फिल्मों की सूची जारी की तो उसमें भी 'दो बीघा ज़मीन' को भी स्थान मिला।


फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' कहानी है गाँव में रह रहे शंभू किसान (बलराज साहनी) और उसके परिवार की। पत्नी (निरुपा रॉय), एक बेटा कन्हैया (रतन) के साथ बीमार पिता गंगू (नाना पलसीकर) हैं। साथ ही एक क्रूर ज़मींदार हरनाम सिंह (मुराद) भी है। गाँव में भयंकर सूखा पड़ता है और शंभू, ज़मींदार से कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है। हरनाम मोटी रकम कमाने के चक्कर में गांव में फैक्ट्री लगाना चाहता है। इसके लिए उसे ज़मीन चाहिए। उसकी निगाह शंभू की दो बीघा ज़मीन पर है। उसे विश्वास है कि शंभू मान जाएगा लेकिन वो मना कर देता है। तब हरनाम, शंभू को धमकाने की गरज़ से उसके नाम पैंसठ रूपए का कोई पुराना कर्ज़ लिया दिखा देता है। और उसे धमकाता है कि या तो शंभू कर्ज़ चुकाए या ज़मीन हरनाम को बेच दे। सूखे के उस दौर में शंभू पत्नी के ज़ेवर बेच जैसे-तैसे पैसा जोड़ कर हरनाम को दे देता है। लेकिन ज़मींदार बताता है कि ब्याज सहित कुल रकम दो सौ चौंसठ रूपए है। शंभू सन्न रह जाता है। वो कोर्ट की शरण लेता है। लेकिन हरनाम यहां भी छल करके फैसला अपने हक़ में करा लेता है। अब उसके ऊपर दोहरी मार पड़ती है और कोर्ट फैसला सुनाती है कि या तो शंभू तीन महीने में कर्ज चुकाए या ज़मीन हरनाम को बेच दे। अब ऐसे में शंभू के सामने एक ही विकल्प बचता है और वो है कि वह कलकत्ता जाए और कमाए।


वो बेटे कन्हैया के साथ कलकत्ता पहुंचता है। लेकिन यहां आकर शंभू को समस्याओं के लंबे सिलसिले का सामना करना पड़ता है। गाँव में तो सिर्फ हरनाम था लेकिन यहाँ एक नहीं कई लुटेरे हैं। कलकत्ता आटे ही उसका सामान चोरी हो जाता है लेकिन कुछ भले लोगों की मदद से बाप-बेटा अपना काम शुरू करते हैं। कन्हैया बूट-पालिश करता है और शंभू हाथ रिक्शा चलाता है। दोनों खूब मेहनत करते हैं। एक दिन एक शंभू ज्यादा भाड़े की लालच में रिक्शा बहुत तेज चलाता है और उसका एक्सीडेंट हो जाता है। इधर गाँव में पारो परेशान है। उसे जब शंभू के एक्सीडेंट की खबर मिलती है तो वो बीमार ससुर गंगू को पड़ोसी के भरोसे छोड़ कर शहर चली जाती है। यहाँ उसको एक गुंडा बहकाने की कोशिश करता है लेकिन वो किसी तरह उसके चंगुल से छूट कर भाग निकलती है और एक कार से टकरा जाती है। शोर मचता है। पारो को अस्पताल ले जाना है। एक रिक्शा रुकवाया जाता है। वो रिक्शा शंभू का है। अस्पताल में डॉक्टर शंभू से दवाएँ और एक बोतल खून के लिए कहता है। शंभू की कमाई सारी पूंजी ख़त्म हो जाती है। इधर कन्हैया पिता की मदद के लिए चोरी करता है और पकड़ा जाता है। इस बीच तीन महीने गुज़र जाते हैं। शंभू और पारो गांव जाते हैं। उनकी ज़मीन पर हरनाम कब्ज़ा करके फैक्ट्री का निर्माण शुरू कर चुका है। शंभू एक मुठ्ठी माटी लेना चाहता है लेकिन सुरक्षाकर्मी उसे ऐसा नहीं करने देता। निराश शंभू और पारो वहाँ से चल देते हैं।


इसमें दो राय नहीं कि हर फिल्म का अपना एक भाग्य होता है और उससे जुड़ी कहानियाँ। इसी तरह फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' से जुड़े कई रोचक प्रसंग हैं। पहले फिल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि फिल्म के अंत में शंभू को उसकी ज़मीन वापस मिल जाती है, लेकिन पारो मर जाती है। बिमल रॉय की पत्नी मोना बिना रॉय को यह अंत बहुत अमानवीय लगा। उन्होंने सुझाया कि ज़मीन जाने दो लेकिन पारो को ज़िंदा रखो और वही हुआ। उनके कहे अनुसार क्लाईमैक्स दोबारा शूट किया गया और उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है।


फिल्म के लिए हीरो का चुनाव कैसे हुआ, यह बात भी दिलचस्प है। हीरो चुनने से पहले बिमल रॉय के दिमाग में नज़ीर हुसैन, जयराज और त्रिलोक कपूर जैसे दिग्गज थे लेकिन उन्हें रिक्शा वाले के गेटअप में उनके सामने खड़े बलराज साहनी ने बहुत प्रभावित किया। तब वो दो मील रिक्शा चला कर आये थे और पसीने से तरबतर बुरी तरह हांफ रहे थे। जनता के हुड़दंग से बचने के लिए आउटडोर शूटिंग के दौरान कैमरा एक कार में छुपा कर रखना पड़ता था। कई बार बलराज साहनी को असली रिक्शावाला समझ लिया गया। उन्हें सवारी बैठानी पड़ी और इसकी एवज़ उन्हें भाड़ा भी मिला। स्टैंड पर रिक्शा लगाने के लिए उनका असली रिक्शेवालों से कई बार झगड़ा भी हुआ। एक बार बलराज को सिगरेट की तलब लगी। उन्होंने शॉप कीपर से महंगी सिगरेट मांगी। लेकिन शॉप कीपर ने उनके रिक्शेवाले का गेटअप देख कर भगा दिया।


जानकार बताते हैं कि उन दिनों बिमल रॉय एक और फिल्म परिणीता भी बना रहे थे। उसकी नायिका मीना कुमारी एक दिन बिमल रॉय से 'दो बीघा ज़मीन' के सेट पर मिलने आयीं। बिमल दा उस समय फिल्म के कुछ स्टिल फोटो देख रहे थे। मीनाजी भी उन्हें देखने लगीं। वो इतनी ज्यादा प्रभावित हुई कि इस फिल्म का हिस्सा बनने को उनका दिल मचल उठा। बिमल दा से अनुरोध करके अपने लिए जमींदार की बहु की एक छोटी सी भूमिका सृजित करवाई। उन पर एक गाना भी फिल्माया गया - आ जा री निंदिया तू आ... मजे की बात यह है कि आज भी इस लोरी को गुनगुनाया जाता है।


सिर्फ यही नहीं बी आर चोपड़ा इसके कथानक और ग्रामीण पृष्ठभूमि से इतना अधिक प्रभावित हुए कि आगे चल कर उन्होंने 'नया दौर' बनाई। यों तो कई समीक्षकों ने 'दो बीघा ज़मीन' को सराहा लेकिन सबसे बढ़िया कमेंट राजकपूर ने दिया था। उन्होंने कहा था, ''काश! मैंने इस फिल्म को बनाया होता!''


 


 


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