महामारी के दौरान भ्रामक ख़बरों से निपटने में जुटे हैं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

नई दिल्ली। एक तरफ जहां दुनियाभर के वैज्ञानिक अभी कोरोनावायरस की वैक्सीन खोजने के लिए खासी मशक्कत कर रहे हैं, वहीँ बाबा रामदेव की कंपनी  पतंजलि आयुर्वेद ने पिछले हफ्ते घोषणा कर दी कि उसने कोविड-19 की ‘दवा’ बना ली है। रामदेव के मुताबिक, कोरोनिल और स्वासरी दवाओं के अच्छे नतीजे सामने आए हैं और इससे परीक्षण में शामिल ऐसे सभी कोरोनावायरस मरीज ‘ठीक’ हो गए जो वेंटीलेटर पर नहीं थे। नई ‘दवा’ की घोषणा और उसके बाद की प्रतिक्रिया में नरेंद्र मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय ने पतंजलि से कोरोनिल का प्रचार रोकने को कहा और उत्तराखंड आयुर्वेद विभाग ने कहा कि कंपनी ने लाइसेंस के लिए अपने आवेदन में कोरोनावायरस का जिक्र तक नहीं किया था। इसने विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी। और सवाल उठा कि महामारी या ऐसी अन्य स्थितियों के दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी कैसी भ्रामक सूचनाएं सामने आती हैं। इन भ्रामक सूचनाओं को इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर का नाम दिया जाता है। 



तक्षशिला इंस्टीट्यूट के पॉलिसी एनालिस्ट रोहन सेठ और प्रतीक वाघरे ने इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर को लेकर व्यापक रिसर्च को अंजाम दिया और हाल ही पोर्टल दि प्रिंट ने इस रिसर्च को प्रमुखता के साथ पोस्ट किया। इसमें कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस समय पूरी तरह इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर से निपटने में जुटे हैं और ऐसे समय में कोरोनिल का आना खासा रोचक हो गया है। इस माह के शुरू में हम इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रतिक्रिया का आकलन करने वाले एक पेपर पर काम कर रहे थे और पाया कि सारी प्रतिक्रियाओं को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है।


1- धनराशि आवंटन: विभिन्न प्लेटफॉर्म की तरफ से कई संस्थानों को धनराशि आवंटित की जाती है ताकि उनकी मदद से इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर को नियंत्रित किया जा सके। इसमें फैक्ट चेकिंग ऑर्गनाइजेशन, मीडिया संस्थान और विश्वसनीय पत्रकारिता से जुड़े सूत्र भी शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर गूगल दुनियाभर में भ्रामक सूचनाओं से निपटने के लिए 6. 5 मिलियन डॉलर राशि खर्च कर रहा है जबकि फेसबुक सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से कहा है कि वह जितनी भी जरूरत पड़े उतने फ्री विज्ञापन दे सकता है।


2- यूजर इंटरफेस (यूआई) में बदलाव: ये प्लेटफॉर्म अपने यूजर इंटरफेस में ही फीड या सर्च रिजल्ट के तौर पर विश्वसनीय पब्लिक हेल्थ अथॉरिटी से जुड़ी सूचनाएं हाईलाइट कर रहे हैं। इसमें कोविड-19 को लेकर एक्सप्लोर सेक्शन फंक्शन और सर्च रिजल्ट दिखाने की प्रक्रिया में भी कुछ बदलाव करना भी शामिल है। उदाहरण के तौर पर गूगल में कोरोनावायरस से जुड़ा कुछ सर्च करने पर एक एसओएस अलर्ट जाता है जिससे विश्वसनीय सूचना से जुड़ा डैशबोर्ड ही सामने आता है।


3- सूचना के प्रवाह में बदलाव: इसमें न्यूज फीड पर कंटेंट की डाउन रैंकिंग, विज्ञापन रोकना या हटाना, पब्लिक हेल्थ अथॉरिटीज के वैरीफाइड चैटबोट दिखाना, कंटेंट मॉडरेशन क्यू को प्राथमिकता देना और यूजर को भ्रामक सूचना के साथ उसके इंटरैक्शन के बारे में सूचित करना शामिल है। उदाहरण के तौर पर इंस्टाग्राम दावा करता है कि वह ऐसे किसी भी कंटेंट को डाउनरैंक कर देगा जिसे किसी थर्ड पार्टी फैक्ट चेकर की तरफ से गलत बताया जा रहा हो। ऐसे झूठे दावों और साजिशपूर्ण सिद्धांतों को हटा देगा जिसे किसी प्रमुख ग्लोबल हेल्थ अर्गनाइजेशन की तरफ से भ्रामक बताया जाए।


4- नीतिगत बदलाव: नीतियों को लेकर इन प्लेटफॉर्म की प्रतिक्रिया एक समान नहीं है। ज्यादातर ने या तो कोविड-19 को लेकर विशेष तौर पर नए सिरे से नीतियां बनाई हैं या मौजूदा नीतियों में कुछ सुधार किया है। वहीं कुछ ने नई नीतियां तो नहीं बनाई हैं लेकिन अपनी मौजूदा नीतियों को ही इस पर लागू कर रहे हैं।


इस संबंध में व्यापक परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रतिक्रिया में एक भिन्नता है और यह देखते हुए कि आने वाले समय में कोरोनावायरस को लेकर इन्फॉर्मेशन डिसऑर्डर बढ़ता ही रहेगा, इन नीतियों पर अमल भी पूरे जोरशोर से होते रहने की प्रबल संभावना है। जब मोदी सरकार पतंजलि को कोरोनिल को कोविड-19 के इलाज के तौर पर प्रचारित न करने का निर्देश दे चुकी है, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की शुरुआती पड़ताल बताती है कि यूजर्स को सूचना के अधिकृत स्रोत की तरफ इंगित करने की इच्छा दर्शाने के बावजूद भ्रामक हैशटैग को ट्रेंड करने से रोकने और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रचार फ्लैग/रिमूव करने में कुछ खास कोशिश नहीं की गई।


अगर वह किसी हैशटैग विशेष पर कार्रवाई करते हैं तो भी समस्या हल होने वाली नहीं है। इससे जुड़े संदर्भ/ट्रेंड मसलन बाबा रामदेव/पतंजति/आयुर्वेद आदि— इस तरह का कंटेंट यूजर के सामने लाते रहेंगे। यह परिदृश्य दर्शाता है कि भ्रामक सूचनाएं और दुष्प्रचार रोकने की कोशिश में इन प्लेटफॉर्म को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सैकड़ों देशों से ऑपरेट होने से इसमें बहुत सारी भाषाओं और भिन्न स्थानीय संदर्भ भी जुड़ जाने के कारण चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं, खासकर इसलिए भी क्योंकि ये प्लेटफॉर्म खुद उत्तर अमेरिका और पश्चिमी यूरोप को लेकर खासी रुचि दर्शाते हैं। 


क्या ये प्लेटफॉर्म हर स्थिति में कार्रवाई कर सकते हैं? क्या उन्हें ऐसा करना चाहिए? सरकार इसके लिए नियम-कायदे क्यों नहीं तय करती है? क्या प्लेटफॉर्म के लिए अकेले काम करना कारगर है या फिर साथ मिलकर? यह बेहद अहम सवाल हैं। जब हम सोशल मीडिया के ज्यादा दखल की बात करते हैं तो इसका आशय उन्हें खुद को सच्चाई का निर्धारक मानने और ज्यादा नियंत्रण की छूट देना है। दूसरी तरफ अगर सरकार इन प्लेटफॉर्म पर ज्यादा नियंत्रण लागू करती है तो बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर दूरगामी असर पड़ेगा।


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