किसी ने नहीं सुनी रामपुकार की पुकार, बेटे की तेरहवीं में भी नहीं हो पाए शामिल


नई दिल्ली। लाचार और बेबस बाप की ऐसी दुखभरी कहानी कि जिसे सुनकर कलेजा मुंह  को आ जाए। बेटे की मौत की ख़बर सुनकर बाप घर से निकला, पैदल.... यह सोच कर कि बेटे का मुंह तो नहीं देख सका पर अब बेटे की तेरहवीं में ज़रूर शामिल हो सकूंगा। लेकिन निर्दयी क़ानून ने रामपुकार की यह ख्वाहिश भी पूरी नहीं होने दी। बड़ी मुश्किलों से रामपुकार अपने गाँव तो पहुँच गए लेकिन क़ानून के रखवालों ने उसे क्वारंटीन सेंटर में क़ैद कर दिया। सब कुछ लुटा कर और तमाम तकलीफें झेलकर अपने गाँव पहुँचने के बावजूद रामपुकार अपने बेटे की तेरहवीं की रस्म में शामिल नहीं हो सके। 


 


बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार  बिहार के बेगूसराय के रहने वाले रामपुकार पंडित बेटे की मौत की ख़बर सुनकर 11 मई को दिल्ली‌ से पैदल ही बेगूसराय के अपने गांव तारा बरियारपुर के लिए निकल पड़े थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहीं यूपी गेट के पास दिल्ली-यूपी बोर्डर पर रोक दिया। यूपी पुलिस उन्हें पैदल जाने की इजाज़त नहीं दे रही थी और रामपुकार के पास इतने पैसे नहीं थे कि कोई प्राइवेट गाड़ी बुक करके घर जाएं। वो स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल भी नहीं करते थे कि रेल की ऑनलाइन टिकट बुक करा सकें या बिहार सरकार से मदद की गुहार के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करा सकें। बिना साधन और पैसे के तीन दिनों तक दिल्ली-यूपी बोर्डर पर फँसे रहने के बाद आख़िरकार एक सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से रामपुकार 15 मई को श्रमिक स्पेशल ट्रेन से दरभंगा लौटे और वहां से अपने प्रखंड खोदावनपुर में बने क्वारंटीन सेंटर में पहुँचे।


रामपुकार बताते हैं, "बेटा चार दिन पहले मरा था। उसको तो आख़िरी बार देख तक नहीं सका इसलिए चाहता था कि कम से कम उसकी तेरहवीं में शामिल हो जाऊं। पिता होने का फ़र्ज़ निभा दूं। पुलिस ने रोक दिया तो हम इधर-उधर भटककर लोगों से मदद माँगने लगे। उसी में दो लोगों ने कहा भी कि वो हमें बोर्डर पार करा देंगे और आगे ले जाकर छोड़ देंगे। लेकिन उन दोनों ने मुझे कार में बैठाकर मेरे साथ मारपीट की और मेरे पास जो बचे-खुचे पैसे थे वो भी छीन लिए।" आगे वो कहते हैं, "एक मैडमजी जो रात में खाना बांटने आई थीं, वो अपना कार्ड भी हमें दे गई थीं। उन्हीं को फ़ोन करके जब मैं सब कुछ बता रहा था तो किसी ने मेरा फोटो ले लिया।" बातचीत में रामपुकार जिस महिला को "मैडमजी" कह रहे थे, उनका नाम सलमा फ्रांसिस है। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और दिल्ली में एक सामाजिक संगठन से भी जुड़ी हैं। सलमा के बारे में रामपुकार और बताते हैं, "वो मेरे लिए मां-बाप से बढ़कर हैं। जब सबने मेरे साथ धोखा किया तब उन्होंने मदद की।"


काफ़ी मशक़्क़त करने और दुःख-तकलीफ़ सहने के बाद रामपुकार अपने गांव के क़रीब तो पहुंच गए हैं, मगर अभी तक अपने घर नहीं पहुँच पाए हैं। नियमों के मुताबिक़ फ़िलहाल वो क्वारंटीन सेंटर में हैं। उनके बेटे की तेरहवीं भी बीत‌ गई है। घरवालों से मिलने की बात पर वो कहते हैं, "कल बेटी और पत्नी आई थीं मुझसे मिलने के लिए। सत्तू, चूड़ा, गुड़, दालमोठ और दवाई लेकर आए थे वो लोग। उनसे बातचीत भी नहीं हो सकी। सारा समय रोते हुए निकल गया। नज़र में हर वक़्त बेटे का चेहरा घूम रहा है। कुछ समझ में नहीं आ रहा। मरे नहीं हैं, बस यही सोचकर ख़ुद को सांत्वना दे रहे हैं। पता नहीं अब आगे क्या होगा!" रामपुकार पहले घर पर ही रहते थे। कुछ दिन तक उन्होंने फेरीवाले का काम किया था। बाद में वो ईंटभट्टे पर रहकर काम करने लगे। तीन बेटियों के बाद पिछले साल ही उनका एक बेटा हुआ था। इसके बाद काम की तलाश में वो दिल्ली चले गए। इस दौरान उनके छोटे भाई ने घर पर रहकर परिवार संभाला। लेकिन क्या परिवार चलाने और पैसे कमाने के लिए क्या फिर से दिल्ली जाएंगे? रामपुकार कहते हैं, "अब चाहे जो हो जाए, काम मिले ना मिले, पैसे कम ही कमाएं। लकड़ी फाड़ कर बेच लेंगे, फिर से ईंट भट्टे पर काम कर लेंगे, किसी के यहां मज़दूरी कर लेंगे, पर दोबारा दिल्ली नहीं जाएंगे। क़सम खा लिए हैं।"


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