थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है………!

 


जयपुर। बेशक, इस लॉकडाउन ने हमें कितना ही बेचैन किया हो, पर इतना तो जरूर है कि इसने हमें सीमित संसाधनों में जीना सिखा दिया। घर में रहते हुए, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, चाहे किसी के घर बीएमडब्लू हो या आल्टो या  फिर बाइक, कोई फर्क नहीं पड़ता। सब भूल गए हैं  हम! सिर्फ और सिर्फ दूरी बनाते, सोशल डिस्टेंसिंग को अमल में लाते रोज़ की जरूरत रह गई है केवल आटा, राशन, सब्ज़ी, दूध और दवा।



पीछे छूट गए वो दिन! मॉल में घूमते-घूमते नए फैशन की वेराइटी देखना, शाम ढले दोस्तों के संग मस्ती, सिनेमा-मल्टीप्लेक्स, वीकेंड में होटल-रेस्तरां जाना! सब कुछ जैसे ठहर गया है। थम गई है ये जिंदगी। घर में सेफ रहो और महामारी से बचो, इसी के चर्चे हैं और यही बहस का मुद्दा भी है।


जो भी हो, हमारे बुजुर्गों की जीवन शैली के मायने और उनका सच भी सामने आ रहा है। हाथ मिलाने की जगह नमस्ते, जंक फ़ूड, पिज़्ज़ा, बर्गर और शीतल पेय के स्थान पर दाल-रोटी, लस्सी, छाछ, चाय और घर में बने देसी व्यंजनों के ठाठ हो रहे हैं। जरूरते सारी सिमट गयी हैं और थोड़े में काम चल रहा है। हम बुजुर्गों को समय दे रहे हैं, जो चाहते हुए भी जीवन की आपाधापी में छूट गया था। बच्चों के संग खेलते बच्चे बनकर खेलने में दिली संतुष्टि महसूस हो रही है। किसी को खाना- राशन पहुंचाते, मास्क बांटते  इंसान औरों के लिए भी दीप जला रहा है।


वे छोटी-छोटी बातें जिनको हमने कमतर आंका था या यूँ कहें कि महत्त्व ही नहीं दिया था, अब उनकी महत्ता समझ आने लगी है। सुबह-सवेरे पंछियों के कलरव के साथ पार्क में घूमना, व्यायाम करना, जब जी चाहे गाडी लेकर निकल पड़ना शहर की किसी एग्जीबिशन में या फिर मित्रो से मिलने, इन सबका क्या मोल है, यह तो तभी जाना जब इनसे दूर जाना पड़ा।


कमोबेश आज मौसम साफ़ है, आसमान धुला-धुला, सभी ओर रंग-बिरंगे पंछी बेखौफ चहचहाते क्योंकि सब ओर पसरा है सन्नाटा। साथ ही वो धूल के गुबार, गाड़ियों का धुंआ जिससे उन्हें भी तकलीफ होती थी, छंट गया है, पर्यावरण शुद्ध और साफ़ हो गया है, प्रदूषण कम हो गया है, गंगा निर्मल बह रही है। फैक्ट्रियों का धुंआ जो उसमे नहीं जा रहा। निश्चय ही हम इंसानों ने अपनी आदतों से कुदरत को बिसरा दिया है, भूल गए हैं कि पंछियों और पशुओं को भी बसेरा चाहिए?


आज लगता है, क्या हम इसी तरह जिंदगी नहीं जी सकते, कम और सीमित खर्च में गुजारा कर इस दुनिया को सब जीव- जंतुओं के रहने की जगह नहीं बना सकते? संकल्प लें कि उम्मीद की लौ जलाएं रखे,  जिंदगी ने जो सबक सिखाया है, उसे भूलें नहीं, जारी रखें। 


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