कोरोना वायरस के दौर में फिर याद आई 'डॉक्टर कोटनिस की अमर कहानी '

मुंबई। इस समय जबकि पूरी दुनिया कोरोना वायरस के प्रकोप को झेल रही है और चीन के साथ इस वायरस का जो सम्बन्ध है, उस बारे में भी बहुत कुछ लिखा जा चुका  है।  ऐसे में बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जिन्हे इस दौर में 1946 में बनी हिंदी फिल्म "डॉक्टर कोटनिस की अमर कहानी" याद आ  रही है। पिछले साल चीन में कोरोनावायरस फैलने के बादप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक पत्र लिखकर इस बीमारी से लड़ने के लिए चीन को हरसंभव मदद देने की बात कही थी।  बाद में चीनी विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि हम भारत के इस प्रस्ताव से अभिभूत हैं एवं धन्यवाद प्रेषित करते हैं। कुछ चीनियों ने यह भी कहा कि भारत के इस प्रस्ताव ने डॉक्टर कोटनिस की याद दिला दी।



पोर्टल दि प्रिंट ने हाल ही डॉक्टर कोटनिस के बारे में एक विस्तृत आलेख दिया है।  इसमें बताया गया है कि महाराष्ट्र के शोलापुर में पैदा हुए डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस ने आज से लगभग आठ दशक पहले चीन में पीड़ित सैनिकों की सेवा करते हुए जिस तरह अपनी जिंदगी समर्पित कर दी, उसके लिए चीन आज भी उनका एहसान मानता है। 1938 में चीन पर जापानी हमला हुआ तो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने जवाहरलाल नेहरू से निवेदन किया कि कुछ डॉक्टर चीन भेजिए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने एक प्रेस विज्ञप्ति के ज़रिये भारतीय जनता से चीन की सहायता करने की अपील की।


सुभाष चंद्र बोस ने स्वयंसेवक डॉक्टरों की एक टीम तैयार की और 22 हज़ार रुपये की राशि चीन भिजवाई। यह एक परतंत्र राष्ट्र की ओर से परतंत्रता से बचने की कोशिश कर रहे दूसरे राष्ट्र को की गई सहायता थी। डॉक्टरों की उस टीम में इलाहाबाद के डॉक्टर एम अटल, नागपुर के एम चोलकर, शोलापुर से डॉक्टर कोटनिस, और बी के बासु एवं देबेश मुखर्जी कोलकाता से थे। इस टीम के सभी डॉक्टर चीन में सेवा करने के बाद भारत वापस आये, सिवाय डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस के।


1939 में यह टीम युन्नान पहुंची, जो उस समय क्रांतिकारियों का आधार शिविर था। वहां उस मेडिकल टीम का स्वागत माओ त्से तुंग ने किया। यह किसी एशियाई देश से चीन पहुंचने वाली पहली मेडिकल टीम थी। डॉक्टर कोटनिस कुल 5 साल चीन में रहे। उन्होंने युद्ध के मोर्चे पर घायल चीनी सैनिकों की सेवा की। 1940 में डॉक्टर कोटनिस की मुलाक़ात क्वो छींगलान नामक एक चीनी नर्स से हुई। तब तक डॉक्टर कोटनिस चीनी भाषा सीख चुके थे। दिसम्बर 1941 में डॉक्टर कोटनिस ने क्वो छींगलान से विवाह कर लिया। विवाह के एक साल बाद एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम उन्होंने इनहुआ रखा, इस चीनी नाम का अर्थ था भारत एवं चीन।


डॉक्टर कोटनिस दिन-रात युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों की सेवा-सुश्रुषा करते रहे।  इतनी मेहनत करने के कारण उनकी सेहत भी बिगड़ने लगी। उन्हें मिर्गी हो गयी और एक दिन मिर्गी के दौरे से ही उनकी मृत्यु हो गयी।  9 दिसम्बर 1942 को वे अपनी पत्नी और पुत्र को हमेशा के लिए छोड़ गए। डॉक्टर कोटनिस को ननकुआन गांव में नायको के कब्रिस्तान में दफनाया गया।  उनकी मृत्यु पर माओ त्से तुंग ने कहा कि ‘हमारी सेना ने एक मददगार खो दिया, चीन ने एक दोस्त को खो दिया। उनकी भावना हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगी।’


चीन में हेपेयी राज्य में शहीद स्मृति स्थल में एक स्थान डॉक्टर कोटनिस को समर्पित किया गया है जहां उनके द्वारा प्रयोग किये गए मेडिकल उपकरण एवं उनके चीन के नेताओं के साथ फोटो प्रदर्शित हैं।  एक फोटो में वे माओ त्से तुंग के साथ नज़र आते हैं।


डॉक्टर कोटनिस के इस बलिदान पर बाद में वी शांताराम ने "डॉक्टर कोटनिस की अमर कहानी" शीर्षक से फिल्म बनाई। यह हिंदी-उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी में निर्मित 1946 की भारतीय फिल्म है। इसकी पटकथा ख़्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी है और वी शांताराम इसके निर्देशक हैं। अंग्रेजी संस्करण का शीर्षक द जर्नी ऑफ डॉ॰ कोटनिस था । दोनों ही संस्करणों में वी शांताराम शीर्षक भूमिका में थे। 


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