कोरोना से लड़ने के लिए ऐप के ज़रिये निगरानी, निजता को लेकर उठने लगे सवाल

नई दिल्ली। कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारें नए ऐप जारी कर रही हैं और इनके ज़रिये आम लोगों की निगरानी की जा रही है। कोरोना से निपटने के लिए हज़ारों लोगों को घरों में  क्वारंटीन किया गया है, उन पर अब सरकार नज़र रखने के लिए तकनीक का सहारा ले रही है। तकनीक के ज़रिए ही कोरोना संक्रमित लोगों के मूवमेंट पर भी नज़र रखी जा रही है। भारत सरकार ने भी हाल ही 'आरोग्य सेतु' ऐप लॉन्च किया है। इसके ज़रिए लोग अपने आसपास कोरोना के मरीज़ों के बारे में भी जानकारी हासिल कर सकते हैं। सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि ये ऐप यूजर्स की निजता को ध्यान में रखकर बनाया गया है। पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा की सरकारों ने ऐसे मोबाइल ऐप शुरू किए हैं जिनके ज़रिए कोरोना वायरस कोविड 19 से संबंधित जानकारियां हासिल की जा सकती हैं। प्रशासन इन लोगों के मोबाइल नंबरों के आधार पर डेटाबेस भी निकाल रहा है ताकि इनके संपर्क में आने वालों की तलाश की जा सके।



इस बीच  दुनिया भर में साइबर एक्सपर्ट इस कदम पर सवाल उठा रहे हैं और इसे लोगों की निजता का हनन बता रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस जैसी महामारी की आपात स्थिति से निपटने के लिए भले ही सरकार का यह क़दम एक हद तक सही लग रहा हो लेकिन अगर लोगों की निजता की बात की जाए और जो जानकारी सरकार इकट्ठा कर रही है उसका इस्तेमाल कब तक होगा और कैसे होगा इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है जो कि चिंता का विषय है। साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि इन ऐप के ज़रिए कोरोना संक्रमित लोगों और होम क्वारंटीन पर रखे गए लोगों पर नज़र रखी जा रही है, जबकि आंध्र प्रदेश सरकार ने कोरोना एलर्ट ट्रेसिंग सिस्टम का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।


मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि ऐसे क़दम सिर्फ़ भारत में ही नहीं दुनिया के कई देशों में उठाए जा रहे हैं। इसराइल सरकार ने कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए लोगों के मोबाइल डेटा पर नज़र रखना शुरू कर दिया है।इसराइल के अलावा, चीन, दक्षिण कोरिया, अमरीका, सिंगापुर, हॉन्ग कॉन्ग में भी सरकारें ऐसे कदम उठा रही हैं।


साइबर क़ानून एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने बी बी सी डॉट कॉम के साथ बातचीत में कहा कि ये इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के ज़रिए इकट्ठा किया जा रहा डेटा जब इस्तेमाल किया जाएगा तो निजता के अधिकार का हनन तो होगा ही साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लंघन होगा जिसमें निजता के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बताया गया है। वे  कहते हैं, "सरकार यह कह सकती है कि ट्रेसिंग जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखकर की जा रही है क्योंकि कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ख़तरा बढ़ रहा है इसलिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ज़रूरी है। लेकिन सरकार ऐसी कोई गारंटी नहीं दे रही कि हालात सुधरने के बाद इस डेटा को नष्ट कर दिया जाएगा। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना बनती है कि इस डेटा का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है।"


ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से लोग डरे हुए हैं इसलिए फिलहाल वो निजता के हनन का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। इस वजह से भारत ही नहीं दुनिया भर में शासकों को ऐसी ताकत मिल रही है जो आगे चलकर जनता के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकती है और उसके परिणाम बुरे हो सकते हैं। विशषज्ञों का कहना है कि लोगों को इसके प्रति जागरूक होना पड़ेगा और अगर उन्हें इस महामारी के ख़त्म होने बाद कानूनी रास्ते भी अपनाने पड़ सकते हैं ताकि वो अपनी निजता और डिजिटल स्वतंत्रता को बचा सकें। क्योंकि ये ट्रेंड दुनिया के कई देशों में है।


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