कौन थी रोशनी, जो बनी 'गुड्डी'

हरनाम सिंह रवैल भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए कोई नया नाम नहीं है। लगभग चार दशकों तक पहले उनकी फिल्मों ने सिने प्रेमियों का मनोरंजन किया फिर उसके बाद उनके बेटे राहुल रवैल का नाम ख्याति प्राप्त निर्देशकों में रहा और अब उनकी तीसरी पीढ़ी दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए तैयार है। जैसा कि हमने ऊपर बताया कि रवैल साहब के बेटे राहुल रवैल से सभी वाकिफ हैं  लेकिन क्या आप जानते हैं कि राहुल रवैल के अलावा हरनाम सिंह की एक बेटी भी थी जिसका नाम रोशनी रवैल था। अपनी लाड़ली बेटी के नाम के तहत अर्थात रोशनी फिल्म्स के बैनर तले ही हरनाम सिंह ने अपनी फिल्मों का निर्माण किया है।



तो  आज हम उसी बेटी अर्थात रोशनी रवैल की बात करेंगे जो भारतीय दर्शकों के लिए भले ही गुमनाम रही हों लेकिन उनकी कहानी भारतीय दर्शकों के लिए गुमनाम नहीं है। जी हाँ यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी तथा जया भादुड़ी अभिनीत फिल्म गुड्डी (1971), रवैल साहब की बेटी रोशनी रवैल के जीवन से प्रेरित होकर बनाई गई थी। दरअसल हुआ यूँ कि रवैल साहब की क्लासिक फिल्म संघर्ष की कहानी लिख रहे थे गुलज़ार और वो यह जानते थे कि रवैल की बेटी रोशनी की ज़िद है कि वह शादी किसी स्टार से ही करेगी। तो उनकी यह जानकारी बनी ‘गुड्डी’की कहानी का बीज। प्रेरणा वास्तविक जीवन से थी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि रोशनी फ़िल्मी दुनिया में ही रहती थी। कलाकारों की दुनिया उससे अनजानी नहीँ थी। वह किसी अभिनेता से शादी करना चाहती थी। पर नायिका जस की तस किसी निर्माता-निर्देशक की बेटी नहीँ हो सकती थी। इसलिए ‘गुड्डी’की कुसुम अर्थात जया भादुड़ी को स्टारों की दीवानी बताया गया, जो कोई भी किशोरी हो सकती थी।


गौरतलब है कि उसी दौरान शत्रुघ्न सिन्हा पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट से पास होकर आए थे और उनका सितारा बुलंदी की तरफ़ बढ़ रहा था। मोहन सहगल की ‘साजन (1969) में दो मिनट का रोल करने के बाद दमदार शत्रुघ्न में सभी को बड़ी संभावनाएं दिख रही थीं। स्वयं रवैल साहब चाहते थे कि शत्रुघ्न उनकी लाड़ली बेटी से विवाह कर लें। इसके लिए शत्रुघ्न को वह अपनी नई फ़िल्म में हीरो के तौर पर 14 लाख रुपए देने के लिए तैयार थे जो उस समय एक अच्छी खासी रकम थी। लेकिन पूनम चंदिरमानी, जिन्हें हम आज पूनम सिन्हा के नाम से जानते हैं, के प्रति उनके लगाव के चलते यह बात आई गई हो गई।


रवेल साहब को तलाश थी अभिनेता दामाद की और उनकी खोज खत्म हुई एक अप्रत्याशित लड़के रतन चोपड़ा पर। मलेर कोटला का रहनेवाला एक सुंदर सा राजकुमार रतन चोपड़ा फ़िल्मफ़ेअर यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स के टैलेंट कॉन्टेस्ट में प्रथम आया था। यह वही कॉन्टेस्ट है जिसमें से राजेश खन्ना और विनोद मेहरा जैसे बेहतरीन कलाकार तराशे गए हैं। जल्दी ही रोशनी और रतन का रिश्ता पक्का हो गया। बेटी को भावी सुपरस्टार मिला है इस ख़ुशी में पूरा रवैल परिवार मगन था। बारातियों का स्वागत करने के लिए दरवाज़े पर गुलाबी साफ़ा बांधे स्वयं लेख टंडन और गुलज़ार खड़े थें। लड़के के बुज़ुर्गों को दूध के गिलास दिए गए। गिलासों में अशरफ़ियां भरी थीं। बारात वाले दिन मुंबई (तब की बंबई) के अंधेरी ईस्ट में बहुत बड़ी खुली महमानों से भरी खचाखच जगह में नाना प्रकार के व्यंजन परोसे गए थे।


लड़का रतन चोपड़ा था सतबहना मतलब सात बहनों का लाड़ला भाई था। बचपन से ही पूरे घर की आंखों का तारा जिसकी हर ख़्वाहिश पूरी की जाती रही थी यानी बिगड़ैल बेटा, और उस पर शराबी। पहली बार बहू यानी रोशनी मलेर कोटला गई तो कहां बंबई के आधुनिक शौचालय और कहां क़स्बाती पाख़ाने। उसे उलटी सी आती लेकिन ससुराल वाले उसकी उलझन समझने के बजाए मज़ाक़ उड़ाते, झिड़कते। सास और ननदें रौब चलातीं। घर वापस लौटी तो बदहवास थी। आखिर वह भी कम लाड़ प्यार में नहीं पली थी।


अब शादी के बाद रतन के पास अपना घर था, शानदार कपड़े थे, पत्नी थी, पैसा था। चाहे जितना पियो कोई रोकटोक नहीं। रिश्ता न चलना था, न चला। जब रवैल साहब रतन चोपड़ा के अनियंत्रित जीवन और अपनी लाड़ली बिटिया के दुःख से परेशान हो गए तो आखिरकार उन्होंने तलाक़ का सहारा लिया। कहते हैं रोशनी से तलाक के बाद काफ़ी दिन इधर उधर टक्करें मारकर वह अपनी नई पत्नी के साथ विदेश में जा बसा।


रतन को पहली फ़िल्म मिली थी मोहन कुमार की 1972 में प्रदर्शित मोम की गुड़िया, जो कोई ख़ास व्यवसाय न कर सकी। उसके बाद 1977 में आई के. बालाचंदर की फिल्म आईना। राजेश खन्ना और मुमताज़ अभिनीत इस फिल्म में रतन चोपड़ा ने सहयोगी कलाकार की भूमिका निभाई थी लेकिन अफ़सोस की इस फिल्म ने भी उनके करियर को कोई ऊंचाई ना दी। जानकार कहते हैं अगर रतन ने अपने को संभाला होता, तो सफल अभिनेता न सही लेकिन राकेश रोशन की तरह रवैल परिवार में निर्माता-निर्दशक बन कर राज कर रहा होता, जैसे रोशनी रवैल का बेटा रजत रवेल कर रहा है।


गौरतलब है कि रजत रवैल, रोशनी रवैल और रतन चोपड़ा के इकलौते बेटे हैं जिन्होंने निर्देशक के तौर पर ज़मीर (1997), दिल ने फिर याद किया (2001) जैसी फिल्मो के अलावा बतौर निर्माता शॉर्ट कट (2009), नो प्रौब्लम (2010), रेडी (2011) और राउडी राठौर (2012) बनाई है। यही नहीं कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया है जिनमें सलमान खान अभिनीत बॉडीगार्ड भी शामिल है। इस फिल्म में रजत ने मोटे सुनामी सिंह की भूमिका की भूमिका थी, जो काफी चर्चित हुई थी। फिल्मों के अलावा रजत बिग बॉस के सातवें संस्करण में भी दिखाई दिए थे लेकिन दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकामयाब रहने के कारण चौदहवें दिन उन्हें बाहर कर दिया गया था। 


हरनाम सिंह रवैल एक जाने माने भारतीय फिल्मकार रहे हैं। रवैल साहब ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरूआत वर्ष 1940 की फिल्म दो रंगिया डाकू से की थी। नौ साल बाद 1949 में आई फिल्म पतंगा ने उनके करियर को चमकाया अवश्य लेकिन उन्हें असली पहचान मिली 1963 में आई फिल्म  मेरे मेहबूब से। फिल्म मेरे मेहबूब के साथ निर्माता/निर्देशक हरनाम सिंह रवैल ने ऊंचाई की जिस बुलंदी को छुआ वह 1976 में आई फिल्म लैला मजनू तक कायम रहा। मेरे मेहबूब के बाद उन्होंने संघर्ष (1968), मेहबूब की मेहँदी (1971) और लैला मजनू (1976) जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ अपने निर्देशन की जादूगरी को कायम रखा। 


गौरतलब है कि इन फिल्मों के अलावा रवैल साहब ने शुक्रिया (1944), ज़िद (1945), झूठी कसम (1948), शरारत (1959), रूप की रानी चोरों का राजा (1961), कांच की गुड़िया (1963) और दीदार ए यार (1982) नामक फ़िल्में भी बनाई, जो भारतीय दर्शकों पर अपनी गहरी पैठ नहीं बना सकी। 1963 में आई फिल्म कांच की गुड़िया ने भले ही रवैल साहब के फ़िल्मी करियर को रोशन ना किया हो लेकिन अभिनेता मनोज कुमार के फ़िल्मी करियर को एक बेहतर शुरूआत अवश्य दी।


भारतीय फिल्म उद्योग के जाने माने फिल्मकार हरनाम सिंह रवैल के बेटे राहुल रवैल भी अपने पिता की तरह एक जाने माने फिल्मकार हैं। उन्होंने लव स्टोरी (1981), बेताब (1983), अर्जुन (1985), डकैत (1987), अंजाम (1994), अर्जुन पंडित (1999) और जो बोले सो निहाल (2005) जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है।


 


 


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