संविधान से ऊपर उठने की कोशिश को सहन नहीं करेगा यह मुल्क़ 

एक सवाल उन सब साथियों से जो नागरिकता संशोधन क़ानून  और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर  के विरोध में खड़े लोगों की भावनाओं को हंसी में उड़ा रहे हैं.. सवाल यह कि अगर यही चीज़ पाकिस्तान में लागू होती और वहां का अल्पसंख्यक हिन्दू किसी बुरी आशंका के चलते भयभीत होता तो क्या आप तब भी इन बिलों को इसी तरह जस्टिफाइ करते ?


बात सिर्फ सिटिज़न अमेंडमेंट एक्ट की भी करें, जिसमें आप कह रहे हैं कि मुस्लिम बाहुल्य देशों के बहुसंख्यक वर्ग को संरक्षण की ज़रूरत नहीं, तो भी इस एक्ट पर इसलिए सवाल उठना ज़रूरी है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, जो कि देश के या किसी बाहरी नागरिक को समान कानून और समान क़ानूनी संरक्षण की गारन्टी देता है, उसके  ख़िलाफ़ है। 


- क्या जिस सरकार के क़दम की आप हिमायत कर रहे हैं वो देश के संविधान से बड़ी है ?
- क्या सरकार के उस क़दम का विरोध होना अनुचित है जो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन करता है
और बात अगर सब अवैध शरणार्थियों को राहत देने की ही है तो धर्म के आधार पर इनका बंटवारा  करने की क्या ज़रूरत है ?
- इस बात का क्या सबूत है कि एन आर सी  के ज़रिये मौजूदा नागरिक सी    की जद में नहीं आएंगे ?



अगर आपको सरकार का यह कदम उचित लगता है, तो आप मानव अधिकारों की इस दमनकारी नीति में सरकार के साथ बराबर के भागीदार हैं। 
    एन आर सी पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगडे का का आर्टिकल हाल ही पढ़ा, जिसमें संजय लिखते हैं कि "सुप्रीम कोर्ट ने जब असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर 1951 को समय के साथ संशोधित करने के आदेश दिए तब इस प्रक्रिया में पूरे 10 साल का समय लगा था, 50,000 सरकारी कर्मचारियों ने इसके लिए काम किया। साथ ही राज्य सरकार को इस पर 12 सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे] जिसके चलते असम की जनता पर इसका चौगुना वित्तीय भार पड़ाकुछ मामलों में जन्म प्रमाण पत्र और टीसी जैसे दस्तावेज जुटाने में ही लोगों को हजारों रुपए खर्च करने पड़े। उनकी दिनचर्या का ज्यादातर हिस्सा इसी काम के इर्द-गिर्द घूमता रहा" , अब आपको यह भी जानना जरूरी है कि असम की जनसंख्या देश की जनसंख्या का महज़ तीन प्रतिशत है, तो इस हिसाब से अगर समूचे देश  की जनता को इस काम के लिए झोंक दिया जाए.. तो इसके नतीजे शायद नोटबंदी से ज़्यादा भयानक होंगे। 


फिलहाल भारत पहले ही गिरती जीडीपी के कारण कई वित्तीय संकट झेल रहा हैऐसे में उसके हालात सुधारने की बजाय एनआरसी और सीएए पर समय खपाना क्या सरकार की समझदारी है
एन आर सी और सी का विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि संविधान की मूल प्रस्तावना ही जब स्वतंत्रता सौहार्द और समानता पर टिकी है तो देश के एक बड़े तबके के मौलिक अधिकारों के साथ  धोखेबाजी कैसे की जा सकती है। बीजेपी सरकार के हिंदुत्ववादी एजेंडे से देश का बच्चा-बच्चा भली-भांति परिचित है.. तो फिर इन कानूनों से अल्पसंख्यक समुदाय भयभीत क्यों ना हो।  उसे यह क्यों ना लगे कि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत... उसके साथ किया जाने वाला अत्याचार है।  इसलिए कि बीजेपी हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है, और मुसलमानों से इस संघी विचारधारा वाली पार्टी की नफरत जगज़ाहिर है.. बीजेपी सरकार के शासन में आने के बाद से हम देख रहे हैं कि देश में हिंदू मुस्लिम के नाम पर बांटने वाली विचारधारा कितनी तेज़ी से पनपी है।  इसी सोच ने अखलाक के हत्यारे पैदा किए, शंभू रेगर पैदा किए।  मगर  जितना इन्होंने  मुसलमानों के खिलाफ अपना प्रोपेगेंडा फैलाया, उतना ही हिंदुस्तान ने मुसलमान की आवाज़ को मुखर किया है।  मुसलमान को कभी अपने लिए सड़कों पर आने की नौबत नहीं आई क्योंकि उनकी आवाज़ हिंदुस्तान ने उठाई, लेकिन आज पहली बार मुसलमान सड़कों पर अगर आए हैं, तो इसलिए नहीं कि किसी आशंका ने उन्हें डरा दिया है। बल्कि उनका साथ देने के लिए आए हैं जो अब तक उनकी आवाज़ बने रहे, जो हिंदुस्तानीयत को बनाए रखने के लिए लड़ते रहे हैं, भारत की उस मूल भावना के लिए लड़ते रहे हैं जो उसकी पहचान हैयह मुल्क सब का है इसकी भावना में सौहार्द है।  तो यह ना समझें कि सड़क पर जो शोर है वो इस भय से उभरा है कि यह बिल हमें समझ नहीं आए।  यह शोर इसलिए है कि वो हुक्मरान सुन लें कि संविधान से ऊपर उठने की कोशिश करेंगे तो यह उनके लिए आसान नहीं होगा।  ममता बनर्जी ने जनता के साथ सड़क पर उतर कर यह दिखाया, तो वहां के गवर्नर को आपत्ति हुई।  वो यह भूल गए कि संघीय व्यवस्था के तहत मुख्यमंतत्री को जनता का हित अहित साधने का उसके साथ खड़े रहने का अधिकार है।  और यह हमारे संविधान की खूबसूरती है और विरोध इसी संविधान को बचाने के लिए है। आज राजस्थान सहित कुछ राज्यों ने साफ कर दिया है कि वो इसमें केंद्र का साथ नहीं देंगे, वो एन आर सी को अपने राज्यों में लागू नहीं होने देंगे।  तो ऐसे तो मतलब बिल का पक्ष लेने वाले लोगों की नज़र में राज्य सरकारें भी बेवकूफ हैं, जो बेवजह की अशांति नहीं चाहतीं। 


 


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