पाकिस्तानी मीडिया में भी छाया नागरिकता बिल
जयपुर। नागरिकता बिल को लेकर बड़े पैमाने पर देश के अनेक हिस्सों में विरोध और प्रदर्शन जारी है और तमाम राजनीतिक दल भी अपने बयान जारी कर रहे हैं। इस बीच सीमा पार पकिस्तान में भी ज्यादातर अखबारों ने नागरिकता बिल को लेकर विरोध जताया है और अपने सम्पादकीय और अपनी खबरों में इस मुद्दे को पर्याप्त स्थान दिया है। बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद के अनुसार पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते भारत का नागिरकता संशोधन बिल सुर्ख़ियों में रहा।
भारत ने हाल ही में नागरिकता संशोधन बिल पास किया है जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंज़ूरी भी मिल चुकी है। यानी इस बिल ने अब क़ानूनी शक्ल अख़्तियार कर ली है।
इस क़ानून के मुताबिक़ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से भारत आने वाले हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाइ, सिख और पारसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। भारत में बहुत सारे लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनके मुताबिक़ ये क़ानून असंवैधानिक है और मुसलमानों को निशाना बनाकर ये बिल लाया गया है। लेकिन इस बिल का ज़िक्र पाकिस्तान में भी हो रहा है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इसके ख़िलाफ़ बयान दे चुके हैं, पाकिस्तानी मीडिया में इसके बारे में ख़ूब चर्चा हो रही है। अख़बार 'जंग ' ने सुर्ख़ी लगाई है, ''छह राज्यों ने मुस्लिम विरोधी क़ानून मानने से इनकार कर दिया है"- अख़बार लिखता है कि भारतीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के इस बिल पर दस्तख़त के बाद ये क़ानून तो बन गया है लेकिन लोगों का विरोध प्रदर्शन भारत के कई शहरों में हो रहा है।
अख़बार लिखता है कि भारत के छह राज्य दिल्ली, मध्य प्रदेश, पंजाब, केरल, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल ने इस क़ानून को अपने राज्य में लागू करने से साफ़ इनकार कर दिया है।
कई शहरों में लोग इसके विरोध में सड़कों पर उतर रहे हैं और पुलिस उनके ख़िलाफ़ लाठीचार्ज कर रही है और आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। पूर्वोत्तर राज्य असम की राजधानी गुवाहाटी में पुलिस की गोली से दो प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है।
अख़बार लिखता है कि सीएबी के ख़िलाफ़ कई शहरों में हुए प्रदर्शन के चलते जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने अपना भारत दौरा स्थगित कर दिया है। अख़बार के अनुसार अमरीका और संयुक्त राष्ट्र ने इस बिल को मुस्लिम विरोधी क़रार दिया है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का कहना है कि सीएबी भेदभावपूर्ण है और इसलिए सरकार को इस क़ानून पर पुनर्विचार करना चाहिए। वहीं, अमरीकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा है कि भारत को अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रखते हुए इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकार बरक़रार रहें।
अख़बार 'नवा-ए-वक़्त ' के अनुसार पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि भारत को पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की हालत पर लेक्चर देना शोभा नहीं देता। प्रवक्ता के अनुसार सारी दुनिया इस क़ानून को मुसलमान विरोधी मान रही है और ''भारत आज अल्पसंख्यकों के क़त्ल का प्रतीक बन गया है। ''