चित्रों और शब्दों में गुरुदेव की दिलचस्प जीवन कथा

बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार रवींद्रनाथ टैगोर की बहुमुखी प्रतिभा के बारे में जानने और समझने की उत्सुकता साहित्य प्रेमियों के मन में हमेशा ही रही है। भारतीय संस्कृति  के सर्वश्रेष्ठ रूप से पश्चिमी देशों का परिचय और पश्चिमी देशों की संस्कृति से भारत का परिचय कराने में टैगोर की बड़ी भूमिका रही तथा आमतौर पर उन्हें आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है।  टैगोर सहज ही कला के कई स्वरूपों की ओर आकृष्ट हुए जैसे- साहित्य कविता, नृत्य और संगीत। दुनिया की समकालीन सांस्कृतिक रुझान से रवींद्रनाथ टैगोर भली-भाँति अवगत थे। साठ के दशक के उत्तरार्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोश का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी।



उन्हें 1913  में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकभाषा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारूपों से उसे मुक्ति दिलाई। धर्म सुधारक देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत कम आयु में काव्य लेखन प्रारंभ कर दिया था। 1870  के दशक के उत्तरार्ध में वह इंग्लैंड में अध्ययन अधूरा छोड़कर भारत वापस लौट आए। भारत में रवींद्रनाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की तथा मानसी की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है। इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल हैं, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही इसमें समसामयिक बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं। दो-दो राष्ट्रगानों के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर के पारंपरिक ढांचे के लेखक नहीं थे। वे एकमात्र कवि हैं, जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत  का राष्ट्र-गान जान-मन-गण और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। 


रवींद्रनाथ टैगोर के अमूल्य जीवन और विशिष्ट साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को रेखांकित करने वाली अनेक पुस्तकें पहले आ चुकी हैं, लेकिन नित्यप्रिय घोष की हाल ही प्रकाशित किताब "रवींद्रनाथ टैगोर - चित्रों और शब्दों में  जीवन कथा" इस लिहाज़ से अलग है कि इसमें तत्कालीन सन्दर्भों में गुरुदेव के योगदान की कालक्रम के अनुसार प्रस्तुति की गयी है।  यह पुस्तक उन महत्वपूर्ण घटनाओं, चर्चाओं और उपेक्षित मुद्दों को भी प्रकाश में लाती है, जिनसे टैगोर को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है।  विभिन्न चित्र और बड़े पैमाने पर शोध किये गए ग्रन्थ उन उपाख्यानों को उजागर करते हैं, जिनसे पाठक अब तक शायद अनजान रहे हैं। पुस्तक में डेढ़ सौ से भी अधिक दुर्लभ और अनूठे चित्र शामिल किये गए हैं।  


नित्यप्रिय घोष की इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद श्रीकांत अस्थाना ने किया है और उनकी  शैली इतनी सहज और सरल है कि आपको कहीं यह आभास नहीं होता कि आप अनूदित कृति पढ़ रहे हैं।  गुरुदेव का पूरा जीवन काल आपके सामने उपस्थित हो जाता है और पाठक आसानी से यह समझ सकता है कि क्यों रवींद्रनाथ टैगोर  जाति , सिद्धांत या पंथ की सीमाओं के पार आज भी हम सबको प्रिय हैं। 



  • पुस्तक - "रवींद्रनाथ टैगोर - चित्रों और शब्दों में  जीवन कथा" 

  • लेखक - नित्यप्रिय घोष/ अनुवाद - श्रीकांत अस्थाना 

  • प्रकाशक - नियोगी बुक्स, ब्लॉक डी , बिल्डिंग नंबर 77, ओखला औद्योगिक क्षेत्र, फेज -1 , नई दिल्ली - 110020 

  • पृष्ठ - 235 / मूल्य - 995 रुपए 


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