विनाश की सृष्टि करता है निरंकुश कलम का प्रवाह

एक संपादक के रूप में महात्मा गांधी प्रेस और सरकार की निरंकुशता को किस तरह देखते थे? गांधी की पहली और सबसे महत्वपूर्ण किताब 'हिंद स्वराज 'में इस विषय पर दिलचस्प जानकारी मिलती है। गांधीजी का मानना था कि कलम की निरंकुशता खतरनाक हो सकती है, लेकिन उस पर व्यवस्था का अंकुश ज्यादा खतरनाक है।


महात्मा गांधी ने अपनी पहली और सबसे महत्वपूर्ण किताब 'हिंद स्वराज संपादक और पाठक के बीच सवाल-जवाब के रूप में लिखी थी। इस किताब को पढऩे से पता चलता है कि इसमें पाठक की भूमिका वाले गांधी ने संपादक की भूमिका वाले गांधी से कैसे-कैसे प्रश्न-प्रतिप्रश्न किस अक्खड़ता से पूछे हैं। आत्मसंवाद के जरिए संसार से संवाद करने का यह तरीका भले ही उनके शब्दों में उन्होंने केवल लेखकीय 'सुभीते की वजह से अपनाया हो, लेकिन अपने साप्ताहिक अखबार 'इंडियन ओपीनियन' की संपादकीय जिम्मेदारियों ने उन्हें ऐसे सवाल-जवाब का अभ्यस्त बना दिया था। बाद में भी, न केवल 'इंडियन ओपीनियन', बल्कि 'हरिजन', 'यंग इंडिया', 'दैनिक नवजीवन' और 'हरिजनसेवक' जैसे पत्रों के माध्यम से पाठकों के कटु से कटु सवालों का सहजता से जवाब देना उन्होंने नियमित रूप से जारी रखा था। साथ ही, प्रेस की स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों पर भी उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे थे।


दक्षिण अफ्रीका के अपने अखबारी दिनों को याद करते हुए महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है - 'समाचार-पत्र सेवाभाव से ही चलाने चाहिए। समाचार-पत्र एक जबरदस्त शक्ति है; लेकिन जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव के गांव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार निरंकुश कलम का प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। लेकिन यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है, तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अंकुश अंदर का ही लाभदायक हो सकता है।'


गांधी लिखते हैं, 'मैं संपादक के दायित्व को भली-भांति समझने लगा और मुझे समाज के लोगों पर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्य में होने वाली लड़ाई संभव हो सकी। इधर हम देखते हंै कि हमारे संपादकीय में भी पाठकों से परस्पर संवाद करने की शैली और स्थान का अभाव होता गया है। उन्होंने स्वयं को सूचना, ज्ञान और विचार का एकतरफा, आधिकारिक और प्रामाणिक स्रोत समझ लिया लगता है। हमारे समय के संपादकों और प्रसारकों को शायद गांधी जैसे संपादकों की विनम्रता से सीखने की जरूरत है। अपने अखबार 'इंडियन ओपीनियन' के बारे में वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, 'इस अखबार के द्वारा मुझे मनुष्य के रंग-बिरंगे स्वभाव का बहुत ज्ञान मिला। संपादक और ग्राहक के बीच का निकट का और स्वच्छ संबंध स्थापित करने की ही धारणा होने से मेरे पास हृदय खोलकर रख देने वाले पत्रों का ढेर लग जाता था। उसमें तीखे, कड़वे, मीठे, यों भांति-भांति के पत्र मेरे नाम आते थे। उन्हें पढऩा, उन पर विचार करना, उनमें से विचारों का सार लेकर उत्तर देना- यह सब मेरे लिए शिक्षा का उत्तम साधन बन गया था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो इसके द्वारा मैं समाज में चल रही चर्चाओं और विचारों को सुन रहा होऊं।'


वास्तव में, अखबार, टीवी या वेब मीडिया की रीडरशिप और व्यूअरशिप उसकी लोकप्रियता का पैमाना उतनी नहीं हो सकती, जितनी कि उसका अपने पाठकों से वैचारिक आदान-प्रदान का स्वस्थ और आत्मीय संबंध। आज 'संपादक के नाम पत्र ' जैसे अनिवार्य स्तंभों का स्वरूप बदल गया है। उसकी गुणवत्ता और महत्ता के साथ-साथ संपादकीय पृष्ठ में उसे मिलनेवाला स्थान भी सिकुड़ता गया है। तो ऐसी स्थिति में आखिर संपादक करें क्या? गांधी ने उस समय के अपने अनुभवों के आधार पर इसका समाधान देते हुए कहा था- '...(अपने अखबार) में मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को केवल खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। मेरे लिए यह अखबार संयम की तालीम सिद्ध हुआ था.....मैं संपादक के दायित्व को भली-भांति समझने लगा और मुझे समाज के लोगों पर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्य में होनेवाली लड़ाई संभव हो सकी, वह सुशोभित हुई और उसे शक्ति प्राप्त हुई।'


28 मई, 1931 को 'यंग इंडिया में महात्मा गांधी ने 'विषैली पत्रकारिता' शीर्षक से की गई एक टिप्पणी में लिखा- 'अखबारों की नफरत पैदा करनेवाली बातों से भरी हुई कुछ कतरनें मेरे सामने पड़ी हैं। इनमें सांप्रदायिक उत्तेजना, सफेद झूठ और खून-खराबे के लिए उकसानेवाली राजनीतिक हिंसा के लिए प्रेरित करनेवाली बातें हैं। निस्संदेह सरकार के लिए मुकदमे चलाना या दमनकारी अध्यादेश जारी करना बिल्कुल आसान है। पर ये उपाय क्षणिक सफलता के सिवाय अपने लक्ष्य में विफल ही रहते हैं; और ऐसे लेखकों का हृदय-परिवर्तन तो कतई नहीं करते, क्योंकि जब उनके हाथ में अखबार जैसा प्रकट माध्यम नहीं रह जाता, तो वे अक्सर गुप्त रूप से प्रचार का सहारा लेते हैं।'


उन्होंने आगे लिखा- 'इसका वास्तविक इलाज तो वह स्वस्थ लोकमत है, जो विषैले समाचार-पत्रों को प्रश्रय देने से इनकार करता है। हमारे यहां पत्रकार संघ है. वह एक ऐसा विभाग क्यों न खोले, जिसका काम विभिन्न समाचार-पत्रों को देखना और आपत्तिजनक लेख मिलनेपर उन पत्रों के संपादकों का ध्यान उस ओर दिलाना हो? दोषी समाचार-पत्रों के साथ संपर्क स्थापित करना और जहां ऐसे संपर्क से इच्छित सुधार न हो, वहां उन आपत्तिजनक लेखों की प्रकट आलोचना करना ही इस विभाग का काम होगा। अखबारों की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य अधिकार है और कोई भी देश इस अधिकार को छोड़ नहीं सकता। लेकिन यदि इस अधिकार के दुरुपयोग को रोकने की कोई सख्त कानूनी व्यवस्था न हो, केवल बहुत नरम किस्म की कानूनी व्यवस्था हो, जैसा कि उचित भी है, तो भी मैंने जैसा सुझाया है, रोकथाम की एक आंतरिक व्यवस्था करना असंभव नहीं होना चाहिए और उसपर लोगों को नाराज भी नहीं होना चाहिए।' गांधी लिखते हैं, 'स्व-विनियमन या आत्म-नियंत्रण का तर्क यदि सच हो तो दुनिया के कितने समाचार-पत्र इस कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? लेकिन निकम्मों को बंद कौन करे? कौन किसे निकम्मा समझे? भलाई और बुराई की तरह उपयोगी और निकम्मे अखबार भी साथ-साथ चलते रहेंगे। लोगों को उनमें से अपनी-अपनी पसंद चुननी होगी।Óसंकेत साफ हैं कि समूची जनता के लोकप्रिय समर्थन की उम्मीद पालने वाले मीडिया के लिए जरूरी है कि एक सवाल वह स्वयं से भी लगातार पूछता रहे। वह यह कि जनता जिस तरह अपने प्रतिनिधियों से लगातार सवाल पूछते रहने की अधिकारी है, क्या वही अधिकार प्रेस ने अपने प्रति भी संस्थागत रूप से जनता को दे रखा है?


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