किसान, मौत और मसाला!

कल्पनाओं, किताबों और कहानी-किस्सों से निकलकर सिनेमा जब अपनी जमीन से जुडऩे की कोशिश करता है, तो माटी की सौंधी खुशबू से महक उठता है। इस खुशबू के पीछे छिपे जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों के अक्स भी हम देख सकते हैं और हमारे जीवन से जुड़े दर्द और तकलीफ की आहट भी हम सुन सकते हैं। हाल के दौर में जब मध्यप्रदेश के मंदसौर से लेकर महाराष्ट्र के नासिक तक और राजस्थान के चौमूं से लेकर पंजाब के फतेहगढ़ तक समूचा इलाका किसान आंदोलन की आग में झुलसता रहा है, ऐसे में यह देखना और भी प्रासंगिक हो जाता है कि सिनेमाई चमक-दमक के बीच किसानों के दुख-दर्द और उनके जीवन की दुश्वारियों को हमारे फिल्मकारों ने कितनी शिद्दत के साथ परदे पर उतारा है।
हालांकि खेती और किसानी से जुड़े विषय फिल्मकारों के लिए कभी बिकाऊ फॉर्मूले नहीं रहे हैं और जब-जब उन्होंने किसानों की जिंदगी को परदे पर उकेरने का प्रयास किया है, तब-तब उनकी सोच 'मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती' तक ही सीमित रही है। ऐसे प्रयास बहुत कम हुए हैं जब किसानों के जीवन से जुड़े सच पूरी ईमानदारी के साथ सामने लाए गए हों। खास तौर पर इक्कीसवीं सदी के गुजरे दो दशकों के सिनेमा पर नजर डाली जाए, तो हमें दूर-दूर तक पसरा एक लंबा सन्नाटा नजर आता है। बीच-बीच में 'लगान' और 'पीपली लाइव' जैसी फिल्मों ने इस सन्नाटे को तोडऩे का प्रयास जरूर किया, लेकिन ऐसी फिल्मों की कामयाबी के बावजूद मुख्य धारा के सिनेमा ने किसानों के अंतस में झांकने की बहुत कम कोशिश की। यूं भी कहा जा सकता है कि तकनीक से सुसज्जित नई पीढ़ी में विमल राय जैसा कोई फिल्मकार नहीं हुआ, जिसने 'दो बीघा जमीन' के बहाने अपनी माटी, अपनी धरती के साथ किसान के जज्बाती रिश्तों की पड़ताल करने की सीधी-सच्ची कोशिश की या फिर कोई महबूब खान नहीं हुआ, जिसने फिल्म 'मदर इंडिया' में गरीबी और विपन्नता के कभी ना खत्म होने वाले चक्रव्यूह के बीच फंसे एक आम किसान परिवार की दास्तान को बेहद असरकारक अंदाज में परदे पर उकेरा था। आज भी 'दो बीघा जमीन' और 'मदर इंडिया' जैसी फिल्में लाखों-करोड़ों लोगों की चेतना का हिस्सा हैं, तो इसकी वजह यह है कि इन फिल्मों ने किसानों के जीवन को पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ परदे पर प्रस्तुत किया।
क्या 'पीपली लाइव' और 'लगान' के बारे में हम ऐसा कह सकते हैं? शायद नहीं। पहले 'पीपली लाइव' की बात करते हैं। यह फिल्म किसानों की बदहाली को दिखाते-दिखाते खुदकुशी के मनोविज्ञान की पड़ताल करने लगती है और बेहद चतुराई के साथ मीडिया के गैर जिम्मेदाराना रवैये पर फोकस करते हुए हमारी संवेदनाओं को झकझोरने का प्रयास करती है। किसान, खुदकुशी और मीडिया- इन तीन प्रसंगों के कारण आखिर तक यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि 'पीपली लाइव' उत्तेजना पैदा करने का एक उपक्रम है या फिर एक नए फिल्मकार की प्रतिबद्धताओं को सामने लाने वाली कोई अलहदा किस्म की फिल्म है। आमिर खान का निर्माता के तौर पर इस फिल्म के साथ जुडऩा अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना मान ली जाती है और इस तरह एक नई निर्देशक अनुषा रिजवी की यह पहली फिल्म रातोंरात चर्चा में आ जाती है। फिल्म के पक्ष में कुछ ऐसा माहौल रच दिया जाता है कि लोग सिनेमाघरों में उमडऩे लगते हैं और बहुत जल्द फिल्म को हिट का दर्जा मिल जाता है। फिल्म के नायक नत्था किसान की बेबसी और लाचारी कामयाबी की चकाचौंध के पीछे कहीं छुप जाती है और रह जाता है सिर्फ तमाशा, जिसमें किसानों की खुदकुशी का मामला भी बेहद छोटा बनकर रह जाता है। आर्थिक दुष्चक्र में फंसे किसानों की मर्मान्तक पीड़ा को लोगों तक पहुंचाने का एक प्रयास अपने दौर की बॉक्स ऑफिस मजबूरियों में उलझ कर रह जाता है और यही वो बिंदु है जहां किसानों की मौत को लेकर उपजने वाली संवेदनाएं भी दम तोड़ देती हैं। 
अलबत्ता 'पीपली लाइव' की इस बात के लिए जरूर तारीफ की जा सकती है कि यह फिल्म किसानों के प्रति बेरहम नजरिया रखने वाले हमारे सरकारी सिस्टम को पूरी तरह बेनकाब करने में कामयाब होती है। यह एक ऐसा सिस्टम है, जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है, लेकिन उसके लिए नहीं जो जीना चाहता है, मुश्किलों से जूझना चाहता है और तमाम दुश्वारियों के बावजूद जो अपनी खेती-किसानी में कायम यकीन को जिंदा रखना चाहता है। इन अर्थों में यह फिल्म सरकारी अमले की पोल खोलते हुए उन योजनाओं का नंगा सच भी लोगों के सामने लाती है, जिनके बारे में लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि इनकी बदौलत ही भारत की तकदीर बदलेगी और यह भारत से इंडिया में तब्दील हो सकेगा। मीडिया का सनसनीखेज चेहरा भी हमारे सामने रखती है यह फिल्म। फिल्म के नायक नत्था के गांव में ही एक मरियल किसान तपती धूप में दिन-रात गड्ढा खोदकर मिट्टी बेचता है, बदले में उसे पन्द्रह से बीस रुपए मिलते हैं। एक दिन उसी गड्ढे में वह दम तोड़ देता है, लेकिन उसकी खबर न मीडिया देता है और न ही कोई नेता उसकी मौत पर अफसोस जताता है, क्योंकि उसकी मौत में वो मसाला नहीं है जिसकी तलाश आम तौर पर मीडिया को रहती है।
अब बात करते हैं 'लगान' की। संयोग से आमिर खान यहां भी हैं, निर्माता के तौर पर भी और फिल्म के नायक के तौर पर भी। फिल्म की कहानी ब्रितानी हुकूमत के दौर की है और चंपानेर गांव के किसानों की दास्तान बयान करती है, जो सूखे और अकाल से बुरी तरह त्रस्त हैं। लेकिन ब्रितानी हुक्मरान को हर हाल में लगान वसूलना है और गांव का नौजवान भुवन जब लगान माफ करने की बात करता है, तो उसे चुनौती मिलती है कि वह पहले ब्रितानी लोगों को क्रिकेट के खेल में हराकर दिखाए, फिर लगान माफी की बात करे। फिल्म में हर वो मसाला मौजूद है जो किसी भी फिल्म को हिट बनाने के लिए जरूरी समझा जाता है। इसमें एकजुटता है, भाईचारा है, प्रतिबद्धता है और इसमें एक खास किस्म का जुनून है, जो शायद गुलामी के दौर के लोगों की खूबी माना जा सकता है। पर फिल्म में किसानों की बदहाली और उनकी निस्सार जिंदगी पर बहुत कम फोकस किया गया है। इसके किरदारों में हमें वो इरादे और मजबूती नजर नहीं आती, जो हमने 'मदर इंडिया' की राधा में देखी है और न ही इसमें वो जुनून है जो हमें 'दो बीघा जमीन' के शंभू महतो में नजर आता है। हालांकि बॉक्स ऑफिस के पैमाने पर फिल्म ने कामयाबी की नई इबारत रची, लोगों ने इसे बेहद पसंद भी किया, लेकिन अपने समग्र अर्थों में 'लगान' किसी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढ़ाई जाने वाली केस स्टडी जैसा प्रभाव छोड़ती है। बड़ी चतुराई के साथ यह फिल्म क्रिकेट को लेकर लोगों के बीच उपजे जोश और जुनून को भुनाने का काम भी करती है और इस फेर में किसानों की व्यथा और उनकी तकलीफ कहीं बहुत पीछे छूट जाती है।
यह देखना भी बड़ा दिलचस्प है कि जहां 'दो बीघा जमीन' आजादी के बाद विकास के नाम पर किसानों से जमीन छीनने के खेल को बेनकाब करने का काम करती है, वहीं 'लगान' आजादी से पहले के दौर में अपना लगान माफ कराने में जुटे किसानों के संघर्ष को हमारे सामने रखती है। संकेत साफ हैं- दौर चाहे कितना ही बदल जाए, किसान को हर हाल में संघर्ष करना ही है। उसे पूंजीपतियों से अपनी जमीन को बचाने की लड़ाई में खुद को झोंक देना है। उसे विकास के मार्ग पर अपने बलिदान से मील के पत्थर कायम करने हैं। और आज वो दौर आ गया है जब उसके पास खुद को वोट बैंक में तब्दील होते देखने के अलावा शायद और कोई चारा नहीं।
जाहिर है कि खेती-किसानी जैसे शुष्क विषय बॉक्स ऑफिस पर रुपयों की बरसात नहीं कर सकते। इसलिए कहानी में भले ही अंडरकरंट के तौर पर किसान से जुड़ा कोई विषय चलता रहे, पर यह मुख्य विषय कभी नहीं बन सकता। शायद यही वजह है कि किसानों पर भारतीय सिनेमा की नजर बहुत कम पड़ी है और इसीलिए किसानों की यंत्रणाओं को आवाज देने का काम भी बहुत कम हुआ है।


Popular posts from this blog

देवदास: लेखक रचित कल्पित पात्र या स्वयं लेखक

नई चुनौतियों के कारण बदल रहा है भारतीय सिनेमा

वैश्विक गायक मुकेश पर ‘सान्निध्य लंदन’ ने किया विशेष अन्तरराष्ट्रीय सभा का आयोजन