हमारे दिमाग को नुकसान पहुंचाता है सोशल मीडिया का इस्तेमाल

सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों को लेकर कई तरह के शोध हुए हैं। हाल ही में फेसबुक ने भी इस संबंध में एक रिसर्च जारी किया है जिसें कहा गया है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल हमारे दिमाग को नुकसान पहुंचाता है। यह शोध ऑनलाइन रिपोर्ट में 'हार्ड क्वेश्चन: क्या सोशल मीडिया पर समय बिताना हमारे लिए सही नहीं है?' सवाल पर हुए बहस पर आधारित है। शोध को फेसबुक के शोध निदेशक और साइकोलॉजिस्ट मोइरा बुर्के के साथ मिलकर लिखा है।
फेसबुक ने कहा है कि शोध के मुताबिक सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले वे लोग जो ज्यादा समय सिर्फ सूचनाएं पढऩे के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने बाद में बुरा महसूस करने की शिकायत की, वहीं जो लोग सूचनाओं के साथ लोगों से जुडऩे और इंटरैक्ट करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं वो बाद में अच्छा महसूस करते हैं। शोध में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोगों से कई तरह के गंभीर सवाल पूछे गए थे। जैसे कि क्या लोग सार्थक ढंग से सोशल मीडिया से जुड़ते हैं या सिर्फ करीबी लोगों से जुड़े रहने तथा उनसे हाल-चाल जानने के लिए ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं?
शोध के परिणामों में सोशल मीडिया के पक्ष और विपक्ष दोनों पर तर्क प्रस्तुत किए गए हैं। शोध में साफ तौर पर यह कहा गया है कि सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल लोगों पर बुरा असर डालता है, लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि लोग इस तकनीक का किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। यूनीवर्सिटी ऑफ मिशिगन में किए गए इस सर्वे में छात्रों से सोशल मीडिया को लेकर रैंडम सवाल पूछे गए थे और उनके जवाबों को रिकॉर्ड किया गया था। इसके पूर्व किए गए अध्ययनों में सोशल मीडिया के कई नकारात्मक प्रभाव गिनाए गए थे। ऐसे ही एक शोध में कहा गया था कि यह लोगों के कॉन्सन्ट्रेशन पर बुरा असर डालता है। इसके अलावा यह डिप्रेशन, चिंता और अकेलेपन का भी कारण बनता है। 
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक पर होने वाली ज्यादातर बहसों का कोई हल नहीं निकलता। लेकिन ऐसा क्यों होता है इस बात को लेकर भी हाल ही वैज्ञानिक व्याख्या सामने आई है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कली और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि शोध दौरान पाया गया है कि जब कोई व्यक्ति किसी से आमने-सामने बात करता है तो उसकी बात सोशल मीडिया की तुलना में कम नकारता है। यानी सोशल मीडिया पर होने वाली बहस को ज्यादातर लोग नकार देते हैं जबकि सीधे तौर पर बात करने पर वह अपनी राय देते हैं। 'द ह्युमनाइजिंग वॉइस' नाम की शोध में कहा गया है बात करने में चीजों का खुलासा होता है जबकि सोशल मीडिया में लिखने से चीजें छुप जाती हैं। मनोवैज्ञानिक विज्ञान की पत्रिका में छपे शोध में कहा गया है इस रिसर्च में 300 लोगों को युद्ध, गर्भपात और संगीत जैसे मुद्दे पर वीडियो, पढऩे के लिए टेक्स्ट और तर्क सुनने के लिए कहा गया।
वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर चल रही बहस के वीडियो और टेक्स्ट पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया था उन लोगों ने जब किसी को इस मुद्दे पर बोलते हुए देखा तो बहस को नकारने वालों की संख्या कम थी। यानी लोग आमने-सामने की बातचीत में मुद्दे को कम नकारते नजर आए। बहस के दौरान जब दो अलग अलग विचार के लोग होते हैं तो वह न सिर्फ एक दूसरे के विरोधी विचारों को समझते हैं बल्कि वे दूसरे के विरोधी विचारधारा से परिचित भी होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि एक विचारवाले व्यक्ति को दूसरे विचार का अनुभव नहीं होता इसलिए वह विरोधी विचारों के बारे में भी जानकारी प्राप्त करता है। कुल मिलाकर शोध में इस बात की पुष्टि हुई कि जिन मुद्दों को लोग सोशल मीडिया में नकार देते हैं वही लोग सीधे तौर पर बात करने से मुद्दे को नहीं नकारते। सोशल मीडिया पर चुप्पी साधने वाले लोग भी कई मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया देते देखे गए।


Popular posts from this blog

जुनूनी एंकर पत्रकार रोहित सरदाना की कोरोना से मौत

'बालिका वधु' जैसे धारावाहिकों के डायरेक्टर रामवृक्ष आज सब्जी बेचने को मजबूर

'कम्युनिकेशन टुडे' ने पूरा किया 25 साल का सफ़र, मीडिया शिक्षा की 100 वर्षों की यात्रा पर विशेषांक