एक मौन युद्ध की दास्तान

न कोई नारेबाजी, न कोई धरना और न आमरण अनशन का सहारा - सिर्फ एक मौन लड़ाई। और लड़ाई भी ऐसी जो लगातार तीन दशक तक चली, फिर कहीं जाकर कामयाबी हासिल हुई। मौजूदा दौर में इस तरह की लड़ाई शायद ही कोई लड़ता नजर आए। लेकिन ओडिशा के गौर हरी दास शायद किसी दूसरी ही मिट्टी के बने हैं। आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले गौर हरी दास खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करना चाहते थे और इस मुहिम में उन्होंने संघर्ष का एक लंबा और थका देने वाला रास्ता चुना। वे चाहते तो दूसरे तमाम लोगों की तरह कोई आसान सा रास्ता चुन सकते थे पर उन्हें अपने उसूलों से समझौता करना कतई मंजूर नहीं था। नतीजा यह हुआ कि संघर्ष के रास्ते पर वे अकेले ही चलते रहे और आखिरकार उन्होंने वो हासिल किया, जिसके लिए उन्होंने इस मुहिम की शुरुआत की थी। आजादी के सिपाही की इसी दास्तान को निर्माता-निर्देशक अनंत महादेवन ने अपनी फिल्म 'गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फाइल' में उतारा है। इस फिल्म में विनय पाठक और कोंकणा सेन शर्मा ने काम किया है। विनय ने स्वतंत्रता सेनानी गौर हरी दास के किरदार को परदे पर साकार किया है और कोंकणा ने उनकी पत्नी की भूमिका निभाई है।


निर्देशक अनंत महादेवन बताते हैं, 'गौर हरी दास आज 85 साल के हैं और अपनी जवानी के दिनों में वे पांच साल तक स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहे। वे छिपकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े साहित्य और संदेशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। ओडिशा में पैदा हुए गौर हरि दास तेरह भाई-बहनों में दूसरे बेटे थे। उनके पिता भी गाँधीवादी थे और उनसे ही उन्हें आंदोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। साल 1945 में उन्होंने अंग्रेजों के आदेश के खिलाफ भारत का झंडा लहराया था, जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। गांधी विचारधारा से जुड़े रहे गौर हरी ने खादी ग्रामोद्योग आयोग में भी लंबे अरसे तक काम किया।'


फिर एक दिन उन्हें स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्र की जरूरत महसूस हुई। दरअसल उनके बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला लेना था और जिस संस्थान में वो दाखिला लेना चाहता था, वहां उसे सीट नहीं मिली। बेटे ने अपने पिता के स्वतंत्रता सेनानी होने का हवाला दिया, तो संस्थान के प्रबंधकों का कहना था कि अगर वो अपने पिता के स्वतंत्रता सेनानी होने का दावा अगर सिद्ध कर दे, तो उसे प्रवेश मिल सकता है। यह बात है 1976 की। गौर हरी दास ने जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में स्वतंत्रता सेनानी प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर दिया। दूसरे तमाम लोगों की तरह उनका भी यही मानना था कि कुछेक दिनों में उन्हें यह सर्टिफिकेट मिल जाएगा और इसके बाद उनके बेटे का एडमिशन इंजीनियरिंग संस्थान में हो जाएगा। पर उन्हें शायद अंदाजा नहीं था कि आजाद हिंदुस्तान में किसी सरकारी दफ्तर से काम निकलवाना कितना दुष्कर काम है। गौर हरी दास अपने प्रमाण पत्र के लिए जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर से लेकर तमाम बड़े अफसरों के यहां चक्कर काटते रहे, पर उनका काम नहीं हुआ। बाद में उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के दम पर आईआईटी मुंबई में दाखिला मिल गया, पर गौर हरी दास अपनी पहचान के संकट से जूझते रहे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए साल 1976 में आवेदन दिया था, जो लंबी जद्दोजहद के बाद उन्हें 2009 में मिला। अर्थात पूरे 33 साल बाद। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि उन्हें अपने आपको स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में पूरे 33 साल लग गए। इस दौरान वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी। गौर हरी के संघर्ष के बारे में निर्देशक अनंत महादेवन कहते हैं, 'उन्होंने तीस साल तक अपने सिद्धांतों को कायम रखते हुए मौन युद्ध जारी रखा, जिसमें आखिरकार जीत उनकी ही हुई। लेकिन इस पूरी लड़ाई ने यह बात एक बार फिर साबित कर दी कि आजाद भारत का सरकारी तंत्र किस कदर फाइलों में उलझा हुआ है।' महादेवन आगे बताते हैं, 'फिल्म में हमने सरकारी दफ्तरों में फाइलें भेजने की उनकी जद्दोजहद को दिखाया है, इसीलिए इसे फ्रीडम फाइल नाम दिया गया है।'


अनंत महादेवन ने इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भेजा और वहां इसे समीक्षकों और दर्शकों ने बहुत पसंद किया। पेरिस के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस फिल्म के लिए विनय पाठक को अवार्ड भी मिला। लेकिन गौर हरी दास का संघर्ष लगता है अभी समाप्त नहीं हुआ है। उनके जीवन पर बनी फिल्म 'गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फाइल' को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में तो भरपूर तारीफें हासिल हुई, पर अपने घरेलू दर्शकों के बीच इस फिल्म को बहुत अच्छा रेस्पॉन्स नहीं मिला। बड़ी मुश्किलों के बाद हाल ही यह फिल्म सिनेमाघरों में पहुंची, लेकिन इसे देखने बहुत कम दर्शक जुटे। फिल्म को सिर्फ 112 स्क्रीन मिले और कुछ ही केंद्रों पर ही यह रिलीज हो पाई। इस फिल्म को लेकर वितरकों और दर्शकों ने जो उदासीनता दिखाई, उससे गौर हरी दास भी नाखुश नजर आए। एक बयान में उन्होंने अपनी अप्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि विचारों से जुड़े सार्थक सिनेमा के लिए आज कोई स्थान नहीं है और मौजूदा दौर के दर्शकों को सिर्फ मसाला फिल्में ही चाहिए।


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